कोसली विधानसभा सीट पर रणघोष की सीधी सपाट बात

विरोधियों ने बंजर करने में कसर नहीं छोड़ी उस पर अब खेती करते नजर आएंगे जगदीश यादव


रणघोष खास. सुभाष चौधरी


दक्षिण हरियाणा में कोसली विधानसभा सीट की हार-जीत का मापदंड तय करने वाले 67 वर्षीय पूर्व मंत्री जगदीश यादव ने विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले अपनी जमीन को नए सिरे से मजबूत करना शुरू कर दिया है। इस बार चुनाव को लेकर कोई किंतु परंतु, रूठना- मनाना, सांठ- गांठ नहीं होगी। 2024 में जगदीश यादव हर हाल में इस सीट पर चुनाव लड़ेंगे। यह स्पष्ट हो गया है।  दो दिन बाद 29-30 अप्रैल को अपने समर्थकों के साथ बेरली पेट्रोल पंप पर  मीटिंग कर जगदीश यादव अभी से तैयारी में जुट जाने का आह्वान करेंगे। इसके लिए कोसली विधानसभा को छह जोन में बांटा गया है। यानि पिछले साढ़े तीन सालों में जगदीश यादव खामोश रहकर अपनी जमीन को सिचिंत करते रहे जबकि उनके विरोधियों ने चुनाव नही लड़ने पर उसे बंजर कहना शुरू कर दिया था। इसमें कोई दो राय नहीं इस सीट पर जगदीश यादव को जीत से ज्यादा हार ने माला पहनाई है लेकिन जनाधार कभी कमजोर नहीं हुआ। चौधरी बंसीलाल एवं इनेलो की सरकार में परिवहन- सहकारिता, शिक्षा एवं वन मंत्री रहे जगदीश यादव की राजनीति केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह परिवार के खिलाफ उगलती आग में तपकर निखरती रही है। इस सीट पर वे अकेले नेता है जो राव परिवार के खिलाफ चुनौती देने की हैसियत रखते हैं। इसलिए राव ने पिछले दो विधानसभा चुनाव में जगदीश यादव की राजनीति को मिटटी में मिलाने  लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। 2014 के विधानसभा चुनाव में अपने छोटे भाई यादुवेंद्र सिंह का साथ देने की बजाय भाजपा उम्मीदवार विक्रम यादव को जीताने में पूरी ताकत लगा दी थी ताकि जगदीश यादव इस लड़ाई का फायदा नहीं उठा ले जाए। 2019 में जगदीश यादव के भाजपा में आने के बाद भी राव ने कोसली से उनके टिकट के सभी दावों को चलने नहीं दिया। एक बार लगा कि जगदीश यादव राजनीति के चक्रव्यूह में फंस चुके हैं इसलिए चुनाव मैदान से खुद को हटा लिया। राव अपने इरादों में कामयाब रहे। मौजूदा राजनीति पर गौर करें तो जगदीश यादव पिछला चुनाव नहीं लड़कर पहले से ज्यादा मजबूत हुए हैं। भाजपा के साथ साथ कांग्रेस- इनेलो- जेजेपी के सीनियर नेता जगदीश यादव की ताकत को बखूबी समझते हैं इसलिए लगातार संपर्क बनाए हुए हैं। जगदीश यादव इस बार टिकट को लेकर किसी भी पार्टी के आश्वासन पर आंखमूंद कर भरोसा करने की बजाय अपने समर्थकों के साथ चुनाव मैदान में उतरने का मन बना चुके हैं। इसलिए टिकट मिलने या नहीं मिलने की स्थिति में वे खुद को पूरी तरह तैयार करने के लिए चुनाव से एक साल पहले ही अपने इरादे जाहिर करने जा रहे हैं। इससे कोसली की राजनीति गरमाना शुरू हो गई है।

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