बैंक वालों की व्यथा की कथा:-एक लेख

 या तो वर्क फ्रॉम होम करो या फिर छुट्टी ले लो।जिंदगी सलामत रही तो काम  फिर कर लेना


 रणघोष खास. पूनम यादव:-


सुनो जी,”आजकल तो अपने बहुत से कामकाजी पड़ौसी वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं।ऐसे में आप रोज बैंक क्यों जाते हो।ये कोरोना की खतरनाक लहर है।रोज ही किसी अनहोनी की खबर सुनने को मिल रही है। मेरा और बच्चों का मन घबराने लगा है।अब तो आप भी या तो वर्क फ्रॉम होम करो या फिर छुट्टी ले लो।जिंदगी सलामत रही तो काम  फिर कर लेना।” ये किसी एक बैंक वाले के घर की कहानी नहीं है।हर वो आदमी जो बैंक में किसी भी पद पर काम कर रहा है वो रोज काम पर जाने से पहले अपने घर में बीवी,माँ-बाप और बच्चों के चेहरे पर इसी डर को देखता है।वो शाम को जब वापिस लौटता है तो उसे ऐसी नजरों से देखा जाता है जैसे वो कोरोना के वायरस को साथ लेकर आया हो।आवश्यक सेवाओं में शामिल बैंकिंग सेवाओं को बिना रुके चलाये रखना इतना आसान नहीं है।जब भी कोई ग्राहक बिना मास्क के या मास्क को मुँह व नाक से नीचे खींच कर बैंक की शाखा में आता है तो उसे देखकर हर कर्मचारी सहम सा जाता है।जनाब को अगर ठीक से मास्क पहनने के लिए बोल दो तो समझो कि आपने आफत मोल ले ली।उसके बाद तो वो ग्राहक बैंक वालों को काम करने का ऐसा उपदेश देने लगता है जैसा भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग के बारे में दिया था।बैंक में पधारे ग्राहक को सोशल डिस्टेंस रखने को बोलो तो साहब बोलते हैं कि अपना पैसा ही तो लेने आये हैं कोई भीख लेने नहीं आये इस बैंक में।मतलब एक बैंक वाला अपनी जान बचाये तो बचाये कैसे।हालांकि कोरोना के इस भयानक दौर में भारत के किसी भी बैंक में एक दिन के लिए भी काम नहीं रुका।अगर रुक जाता तो एक दिन भी अर्थव्यवस्था का चक्का घूमना मुश्किल हो जाता। वैसे बैंक वालों को आजकल प्रशंसा तो छोड़िए सहानुभूति भी नहीं मिलती है। लोग विजय माल्या और नीरव मोदी का गुस्सा भी काउंटर पर बैठे उस क्लर्क पर निकालते हैं जो बेचारा डेबिट क्रेडिट की एंट्री कर रहा है।कोई भला ये तो पूछे कि माल्या और नीरव मोदी का लोन क्या इस बेचारे क्लर्क ने पास किया था? लोगों की संवेदनहीनता उनके व्यवहार से साफ झलकती है।जिन बैंक वालों ने इस महामारी में अपने साथी कर्मचारियों को खोया है,उन्हें इतना वक़्त भी नहीं मिल पा रहा कि वो अपने साथी को श्रद्धांजलि दे सकें। किसी बैंक के उच्चाधिकारी से बात करके देखिए।आपको पता चल जाएगा कि किस तरह से वो अपने साथी बैंक कर्मियों को बैंक में आने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।बेशक वो अधिकारी खुद डरा हुआ हो लेकिन अपने सहकर्मियों को कभी ये जाहिर नहीं होने देता।जब भी उसे पता चलता है कि किसी ब्रांच में कोई कोरोना की गिरफ्त में आ गया है तो वो उसका हाल बाद में पूछता है लेकिन ये चिंता पहले करता है कि अब उस ब्रांच में काम कैसे चालू रखा जाए?क्या आपने किसी बैंक वाले को किसी मनोचिकित्सक के पास जाते देखा है?अगर नहीं देखा तो भी आप ये जरूर समझ लीजिए कि अधिकतर बैंक वाले इस वक़्त तनाव में हैं और गूगल पर सर्च कर रहे हैं कि कैसे वो खुद को कोरोना से बचा सकते हैं।कोरोना के इस विपत्तिकाल में डॉक्टर,नर्स,पुलिस,सेना आदि की भूमिका प्रशंसनीय है और सही मायने में ये लोग सच्चे नायक हैं जो घर में सुरक्षित रहकर नहीं बल्कि बाहर निकलकर कोरोना से लड़ाई लड़ रहे हैं।इस कड़ी में आप बेशक बैंक वालों को शामिल ना करें लेकिन कम से कम इतना जरूर याद रखें कि इस मुश्किल वक़्त में आपको दवाइयों और राशन के लिए भी जिस पैसे की जरूरत पड़ती है,उसी पैसे को बैंक में सुरक्षित रखने और सही समय पर आपको वापिस देने का काम बैंक वाले ही कर रहे हैं।आपकी तनख्वाह,पेंशन,आपकी जमापूंजी और सरकारी योजनाओं के माध्यम से मिला पैसा आपके खातों से आपकी जेब तक पहुँचाने का काम बैंक वाले बिना रुके और बिना थके कर रहे हैं। एटीएम और अन्य मनी ट्रांसफर सुविधाओं का संचालन भी बैंक वाले ही कर रहे हैं।ऐसे में अगर आप अपने बैंक की शाखा में जाते वक्त सही तरीके से मास्क पहन लें,हाथों को सेनिटाइज कर लें और सोशल डिस्टेंस बनाये रखें तो आप अपने साथ-साथ अपने बैंक वालों को भी सुरक्षित रख पाएंगे।हाँ,अगर आपको ये लेख पसंद आया हो तो अगली बार बैंक में जब भी जायें तो वहाँ काम कर रहे लोगों को सिर्फ मुस्कराकर देख लें।इससे शायद उन बैंक वालों को इस जानलेवा माहौल में काम करने की नई ऊर्जा मिल जाये।

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