रणघोष खास में पढ़िए : 2 क्लर्क, 1 निदेशक, 1 कमरा यह है एम्स दरभंगा

– पढ़िए इसे घोषित करने और भूलने की राजनीतिक जल्दबाजी की कहानी


बिहार के दरभंगा में दूसरा एम्स देने की योजना 2015 में यहां के लोगों के लिए एक प्रतिष्ठा की बात थी. लेकिन पिछले 8 साल में यहां क्या क्या हुआ है.


रणघोष खास. ज्योति यादव दि प्रिंट की रिपोर्ट


दरभंगा: न जमीन, न भवन, न डॉक्टर, न एमबीबीएस का एक भी छात्र और न ही कोई मरीज. पिछले आठ साल में बिहार में एम्स दरभंगा कुछ भी मैनेज नहीं कर पाया है सिवा इसके कि यह एक कार्यकारी निदेशक – डॉ माधबानंद कर की नियुक्ति कर पाने में कामयाब रहा है.जब अगस्त 2022 में कर दरभंगा पहुंचे, तो जिला प्रशासन ने उन्हें एक कंप्यूटर ऑपरेटर, दो क्लर्क, एक कार्यालय सहायक और आधिकारिक सर्किट हाउस में एक कमरा प्रदान किया. डिविजनल कमिश्नर के ऑफिस को कर के ऑफिस में परिवर्तित कर दिया गया. वहां पर डीआईजी की जगह एम्स निदेशक की नेमप्लेट है.यह दरभंगा एम्स की अब तक की कहानी है. मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए जिला कस्बों में एक नए एम्स की घोषणा करने की राजनीतिक दौड़ की एक दयनीय कहानी. जो बिना किसी तैयारी और बिना किसी जमीन के तैयार की गई है. कई मायनों में, यह राजनीतिक लाभ के लिए दूर-दराज के इलाकों में नई ट्रेनों की घोषणा करने की हड़बड़ी से अलग नहीं है. दोनों बढ़ती क्षेत्रीय आकांक्षाओं के लिए राजनीतिक प्रतिक्रिया के उदाहरण हैं.इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, बिहार शाखा के सदस्य डॉ अजय कुमार ने कहा, “कुछ लोग डीएमसीएच में एम्स चाहते थे, कुछ इसे कहीं और चाहते थे. एम्स दरभंगा परियोजना पर स्पष्टता की कमी ही बड़ी मुसीबत में बदल गई.”
एम्स दरभंगा अकेला नहीं है.
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी 2015 में एक रैली के दौरान रेवाड़ी में एम्स खोले जाने की घोषणा की थी, जिसके बाद पूरे क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई थी. लेकिन इसके बाद विरोध प्रदर्शन, बैठकों का अंतहीन दौर, देरी और एनओसी के भेंट चढ़ गया. इस बात को सात साल बीत चुके हैं लेकिन, हरियाणा ने अभी तक राज्य का पहला और देश का 22वां एम्स बनाने के लिए आवश्यक भूमि नहीं सौंपी है.पश्चिम बंगाल में केंद्र-राज्य के बीच चूहे-बिल्ली का खेल भी चल रहा है. 2013-14 में, पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह रायगंज जिले में एक एम्स स्थापित करना चाहते थे क्योंकि उत्तर बंगाल में चिकित्सा सुविधाओं की कमी थी. लेकिन सीएम ममता बनर्जी कल्याणी को लेकर उत्सुक थीं.एक रिटायर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के नौकरशाह ने दिप्रिंट से कहा, “राज्य और केंद्र के बीच एक के बाद एक कई लेटर लिए दिए गए, अंत में, हमें राज्य जो चाहता था वही करना पड़ा. लेकिन कल्याणी राज्य की राजधानी के करीब है और उसके पास एक अच्छा जिला अस्पताल भी है. नॉर्थ बंगाल को इसकी (एम्स) बहुत अधिक जरूरत थी.”
एम्स, वोट, राजनीति
दरभंगा शहर की सुनसान गलियों में एम्स सिर्फ अस्पताल नहीं है. यह निवासियों और राजनेताओं दोनों के लिए एक भावना और प्रतिष्ठा का प्रतीक है.दरभंगा से भाजपा के विधायक संजय सरावगी ने एम्स में देरी के लिए “राजनीति” को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा, “नीतीश कुमार जानते हैं कि उद्घाटन केवल पीएम मोदी द्वारा किया जाएगा और इसका श्रेय उन्हें ही जाएगा. इसलिए उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए जमीन का मुद्दा बनाया है कि कोई बड़ा अस्पताल न बन सके. ”28 फरवरी 2015 को, तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में घोषणा की कि सरकार जम्मू और कश्मीर, पंजाब, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश और असम में पांच नए एम्स स्थापित करने जा रही है.उन्होंने कहा था, “बिहार में चिकित्सा सेवाओं को बढ़ाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, मैं राज्य में एम्स जैसा एक और संस्थान स्थापित करने का प्रस्ताव करता हूं.” बिहार का पहला एम्स, पटना में, तत्कालीन उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत द्वारा इसकी आधारशिला रखे जाने के आठ साल बाद, 2012 में अस्तित्व में आया था.12 करोड़ की आबादी के लिए केवल 1.19 लाख डॉक्टरों वाले राज्य बिहार में एम्स जैसी एक और संस्था की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई.पटना जिले के बख्तियारपुर कस्बे के 40 वर्षीय राकेश पासवान ने कहा, ‘हमारे राज्य में एक और दिल्ली जैसा एम्स आ रहा है, तेज बुखार होने पर यह किसी इंजेक्शन से कम नहीं है.’बिहार में 2015 के अंत में विधानसभा चुनाव होने थे.

अगले दो वर्षों में असम, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव निर्धारित थे – इन सभी राज्यों को एक नया एम्स आवंटित किया गया था. एम्स, राजनीति और वोटों के इर्द-गिर्द घूमता रहा. इसने स्थानीय बूथ कार्यकर्ताओं के भाषणों तक में अपनी जगह बनाई.पासवान ने कहा, “यह उन चीजों में से एक है जो हमें 2020 में विधानसभा चुनाव के दौरान लगातार याद दिलाई गई थी. अगर भाजपा सत्ता में आती है, तो डबल इंजन सरकार बनेगी और एम्स परियोजना वास्तव में आगे बढ़ सकती है.”दिल्ली एम्स में एक प्रोफेसर ने कहा, “एक मुख्यमंत्री एम्स की मांग करता है और आप इसकी घोषणा करते हैं. आप अगले राज्य में जाते हैं, एक अन्य सांसद मांग करता है और आप इसकी घोषणा करते हैं. लेकिन मुख्यमंत्री ऐसा नहीं चाहते. आपने एक तरह से एक खिड़की खोल दी है जहां कोई भी निर्वाचन क्षेत्र विरोध में बैठ सकता है और एम्स की मांग कर सकता है. उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि नए एम्स की घोषणा नीति से ज्यादा राजनीति से जुड़ी है.हालांकि, यह घोषणा, वादे के खेल का एक छोटा सा हिस्सा है. इसके बाद जमीन तलाशने, भूमिकाएं तय करने और फंड से जुड़े तौर-तरीकों पर काम करने की कवायद शुरू हो जाती है. इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए चीजों की फेहरिस्त लंबी है.दरभंगा में एम्स की घोषणा करने के तीन महीने बाद, दिल्ली ने जून 2015 में पटना को पत्र लिखकर कहा कि एक महीने के भीतर चार-लेन सड़क जो संपर्क में हो, पानी की आपूर्ति और बिजली के साथ तीन-चार उपयुक्त 200 एकड़ भूमि की पहचान करें .इंडिया टुडे के अशोक उपाध्याय द्वारा राज्य और केंद्र के बीच हुए पत्राचार पर प्राप्त आरटीआई जवाब एक ऐसी कहानी बताते हैं जो जानबूझकर राजनीति में घसीटने वाली प्रतीत होती है.पटना ने महीनों तक प्रस्ताव को पटल पर रखा. दिल्ली ने दिसंबर 2015 में और दूसरा मई 2016 में रिमाइंडर भेजा था.केंद्र की तरफ से भेजे गए पत्र में कहा गया है, ”इस मामले पर पीएमओ की करीबी नजर है.”जब बिहार ने आखिरकार अगस्त में जवाब दिया, तो उसने केंद्र से खुद जमीन की पहचान करने को कहा.

इस जवाब के चार महीने बाद, केंद्र ने एकबार बिहार को एक और पत्र भेजा: “जैसा कि आप जानते हैं कि नए एम्स की स्थापना के लिए भूमि की पहचान करना राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है.”इस रिमाइंडर का जवाब देने में बिहार को और तीन महीने लग गए. बिहार सरकार पहले अपने रुख पर कायम रही कि केंद्र को खुद ही जमीन की पहचान करनी चाहिए. दिल्ली ने अप्रैल 2017 में फिर से पत्र लिखकर राज्य से अपनी जिम्मेदारी निभाने को कहा.फरवरी 2018 में दिल्ली की अंतिम चेतावनी, बिहार के तत्कालीन मुख्य सचिव और सीएम नीतीश कुमार के पसंदीदा नौकरशाह अंजनी कुमार सिंह को भेजी गई थी, जिसमें स्पष्ट किया गया था: “यदि 15 दिनों के भीतर कोई जवाब नहीं मिलता है, तो दिल्ली के एम्स जैसा बिहार में दूसरा संस्थान स्थापित करने के प्रस्ताव पर विचार नहीं किया जाएगा.बिहार सरकार को जमीन तो मिल गई लेकिन यह दरभंगा एम्स की गाथा की शुरुआत भर थी.

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