संदर्भ :17 मई जयंती पर विशेष

अल्हड़ बीकानेरी जंयती पर विशेष : हरियाणवी पूत हैं पर राजस्थानी समझे जाते हैं


रणघोष विशेष. सत्यवीर नाहड़िया की कलम से


गांव का कोई श्यामू, शहर का श्याम या नगर का श्यामलाल या फिर महानगर का श्यामलाल शर्मा तो बन सकता है किंतु छोटे से गांव का श्यामू यदि देश और दुनिया के लिए अल्हड़ बीकानेरी के रूप में लब्धप्रतिष्ठ होता है तो उस शख्स की रचनाधर्मिता, साधना एवं संघर्ष की दास्तान का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। बात चाहे काव्य मंचों पर छंद बद्ध हास्य रचनाओं की रही हो या फिर ग़ज़लों की, बीकानेरी जी अपनी मौलिक विशेषताओं के लिए जाने जाते रहे।

17 मई, 1937 को हरियाणा प्रदेश के वर्तमान रेवाड़ी जिले के अंतर्गत बीकानेर गांव में जन्मे बालक श्याम की प्रारम्भिक शिक्षा गांव में हुई तथा अहीर कालेज रेवाड़ी में विज्ञान विषयों के विद्यार्थी के रूप में दाखिला लिया। विषम परिस्थितियों में पढ़ाई के बीच में छोड़कर पहले कस्टोडियन विभाग फिर डाकतार विभाग में नौकरी की। बचपन से ही कला, साहित्य एवं संगीत में विशेष रूचि रखने वाले श्यामलाल पर पत्नी, पिता, दो पुत्रों तथा भानजे के निधन की श्रृंखला से दुखों का पहाड़ टूट पड़ा तथा यह दर्द गीतगज़लों के रूप में रिसने लगा। माहिर बीकानेरी के नाम से जन्मा यह शायर अनायास काका हाथरसी की फुलझड़ियों से बेहद प्रभावित हुआ तथा रसपरिवर्तन के साथ नाम परिवर्तन कर अब अपनाअल्हड़पनहास्यव्यंग्य की दुनिया में दिखाना प्रारंभ कर दिया। प्रसिद्ध रचनाकार गोपाल प्रसाद व्यास के शिष्य बनने के बाद तो अल्हड़ जी ने काव्यमंचों पर छंदबद्ध गेय रचनाओं से जो धूम मचाई उसी रचनाधर्मिता का प्रतिफल रही भज प्यारे तू सीताराम, घाटघाट घूमे, अभी हंसता हूं, अब तो तू आंसू पोंछ, भैंसा पीवे सोमरस, ठाठ गज़ल के, रेत पर जहाज, अनछुए हाथ आदि जैसी चर्चित कृतियां तथा काका हाथरसी पुरस्कार, राष्ट्रपति पुरस्कार, काव्य गौरव सम्मान, ठिठोली पुरस्कार, यथासंभव सम्मान आदि की उपलब्धियां।

सन् 1986 में उन्होंने हरियाणवी फीचर फिल्मछोटीसालीका निर्माण करते हुए इसकी कहानी, गीत लिखने के अलावा अनेक प्रभार संभाले। रेवाड़ीझज्जर मार्ग पर रेवाड़ी से नौ कि.मी. की दूरी पर स्थित गांव बीकानेर अपने आंचल में अल्हड़ जी से जुड़ी अनेक अनमोल स्मृतियां सहेजे है। अल्हड़ जी की शैली में लिखने एवं कहने वाले उनके शिष्य बीकानेरवासी हास्यकवि हलचल हरियाणवी के मानसपटल पर अल्हड़ जी का तमाम यादें अंकित हैं।

आज जब काव्यमंचों पर हास्य के नाम से चुटकलेबाजी एवं  फूहड़ता परोसी जा रही है तो अपनी छंदबद्ध गेय रचनाओं से मंच को गरिमा प्रदान करने वाले अल्हड़ जी अनायास ही याद जाते हैं तथा उनका नाम जुबां पर आते ही याद आती है, उनकी चर्चित चुटकी जो उन्होंने अपने परिचय में विभिन्न अवसरों पर लटकेझटके लेकर सुनायी थी

कैसा क्रूर भाग्य का चक्कर, कैसा विकट समय का फेर।

कहलाते हम बीकानेरी, कभी ना देखा बीकानेर।।

जन्मेबीकानेरगांव में, है जो रेवाड़ी के पास।

पर हरियाणा के यारों ने, कभी डाली हमको घास।।

हास्य व्यंग्य के कवियों में, लासानी समझे जाते हैं।

हरियाणवी पूत हैं परराजस्थानी समझे जाते हैं।।

गांव के सरपंच रहे दयाराम से लेकर गांव के मास्टर जयनारायण, कैप्टन रामपत्त, डॉ. क्षेत्रपाल आर्य, ताराचंद शास्त्री, जयप्रकाश आर्य आदि दर्जनों बुद्धिजीवियों को आज भी 14 जनवरी 1981 को अल्हड़ जी के अभिनंदन में बीकानेर गांव में रातभर चला वह कविसम्मेलन याद है जिसमें यहां अल्हड़ जी के सम्मान में अशोक चक्रधर, ओमप्रकाश आदित्य, जैमिनी हरियाणवी, जयंत प्रभाकर, चिरंजीत शर्मा, बिमलेश राजस्थानी जैसे चर्चित हास्य कवियों ने बुधराम कला केंद्र के तत्त्वावधान में सुबह पांच बजे तक श्रोताओं को बांधे रखा था। आजीवन हास्यव्यंग्य को समर्पित रहे अल्हड़ जी ने भी अनेक बार वक्त के तकाजे पर वीररस में भी छक्के लिखे जैसे

फुलझड़ियां कैसे लिखें, अब अल्हड़ कविराज।

शत्रु खड़ा है देश की, सीमाओं पर आज।

सीमाओं पर आज, अक्ल उसकी बौराई।

चला गांव की ओर, मौत गीदड़ की आई।

वीर सैनिकों, अगर शत्रु से ठन जाएगी।

कलम हमारी भी मशीनगन बन जाएगी।।

 उनके बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व को चिरस्थायी एवं प्रेरणापुंज बनाने के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी ने उनके तथा ओमप्रकाश आदित्य के नाम से संयुक्त रुप से अल्हड़,-आदित्य सम्मान सम्मान प्रारंभ किया हुआ है। रेवाड़ी में भी प्रति वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर साहित्यिक कार्यक्रमों के माध्यम से उनका भावपूर्ण स्मरण किया जाता है।

हिंदी सेवा समिति की रेवाड़ी शाखा आज उनकी जयंती पर ऑनलाइन कार्यक्रम करके उनका भावपूर्ण स्मरण करेगी, जिसमें स्थानीय रचनाकारों के अलावा देश के दिग्गज मंचीय कवि शिरकत उन्हें श्रद्धांजलि देंगे।

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