Balochistan Violence Pakistan | Why Baloch Attacks Are Warning for China & USA
बलूचिस्तान में फिदायीन हमलों से पाकिस्तान में तबाही, 800–1000 लड़ाकों की आशंका। क्यों ये हिंसा चीन और अमेरिका के लिए गंभीर चेतावनी मानी जा रही है, पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत एक बार फिर खून-खराबे और हिंसा की आग में झुलस रहा है। बीते दिनों हुए सिलसिलेवार फिदायीन हमलों ने पूरे इलाके को दहला दिया है। इन हमलों में कई बलूच विद्रोहियों ने खुद को उड़ा लिया, जबकि करीब 31 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। इसके बाद पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू की, जिसमें डेढ़ सौ से अधिक विद्रोहियों के मारे जाने की खबरें सामने आ रही हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि अब इन हमलों को केवल पाकिस्तान की आंतरिक समस्या नहीं, बल्कि चीन और अमेरिका के लिए भी एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
क्वेटा में पाकिस्तान के इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी के मुताबिक, हालिया समन्वित हमलों में 800 से 1,000 तक बलूच लड़ाके शामिल हो सकते हैं। भारी हथियारों से लैस विद्रोहियों ने कई पुलिस स्टेशनों को निशाना बनाया और शहर की प्रमुख सड़कों पर भी हमले किए। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि बलूच विद्रोह अब पहले से कहीं ज्यादा संगठित और आक्रामक हो चुका है।
बलूचिस्तान वह इलाका है जहां अमेरिका और चीन दोनों के बड़े रणनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना और दुर्लभ खनिजों से भरपूर यह प्रांत दशकों से विकास से दूर रहा है, लेकिन इसकी संपदा पर बाहरी शक्तियों की नजर लगातार बनी हुई है। जानकारों का कहना है कि यही कारण है कि हालिया हमले अमेरिका और चीन के लिए एक तरह की वेक-अप कॉल साबित हो सकते हैं।
अमेरिका ने हाल ही में बलूचिस्तान के चगाई जिले में स्थित रेको डिक क्षेत्र में सोने और तांबे के खनन के लिए 1.25 बिलियन डॉलर के निवेश का समर्थन किया है। इसके अलावा, मिसौरी स्थित एक अमेरिकी कंपनी ने पाकिस्तान की फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गनाइजेशन के साथ 500 मिलियन डॉलर का समझौता भी किया है, जिसका उद्देश्य दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और अन्य खनिजों के निष्कर्षण और शोधन की संभावनाओं को तलाशना है।
वहीं चीन के लिए बलूचिस्तान का महत्व और भी ज्यादा है। यह प्रांत चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का अहम हिस्सा है, जो बीजिंग की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की रीढ़ माना जाता है। ग्वादर पोर्ट से लेकर सड़क, रेल और ऊर्जा परियोजनाओं तक चीन का अरबों डॉलर का निवेश इस क्षेत्र से जुड़ा है। ऐसे में बढ़ती हिंसा सीधे तौर पर चीनी हितों को भी खतरे में डाल रही है।
बलूचिस्तान में संघर्ष कोई नया मुद्दा नहीं है। 1948 से ही पाकिस्तानी सुरक्षा बल और बलूच विद्रोही आमने-सामने रहे हैं। हालांकि 2020 के बाद से बलूच मुक्ति आंदोलन अपने सबसे उग्र और संगठित दौर में पहुंच गया है। हालिया हमले इस बात का संकेत हैं कि यह आंदोलन अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय प्रभाव वाला मुद्दा बनता जा रहा है।
बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार और बाहरी ताकतें बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर शोषण कर रही हैं, जबकि स्थानीय लोगों को उसका कोई लाभ नहीं मिल रहा। यही असंतोष हिंसक विद्रोह का रूप ले चुका है। विदेश नीति विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने भी चेतावनी दी है कि बलूचिस्तान में हो रहे ये हमले उन सभी के लिए चेतावनी हैं, जिनकी नजरें पाकिस्तान के महत्वपूर्ण खनिज भंडारों पर टिकी हैं।
कुल मिलाकर, बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा न केवल पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि चीन और अमेरिका जैसे वैश्विक खिलाड़ियों के लिए भी यह सोचने का वक्त है कि क्या उनके आर्थिक हित इस अस्थिरता की आग को और भड़का रहे हैं।