गुजरात में BJP को झटका: दाहोद के आदिवासी नेताओं ने थामा कांग्रेस का हाथ, बढ़ी सियासी हलचल

गुजरात की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है, जहां आदिवासी बहुल Dahod जिले में भारतीय जनता पार्टी को बड़ा झटका लगा है। यहां के कई वरिष्ठ आदिवासी नेताओं ने पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है, जिससे राज्य में सियासी हलचल तेज हो गई है।

पार्टी छोड़ने वालों में जिला पंचायत सदस्य Maheshbhai Machhar और पूर्व सरपंच Jayantibhai जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। इन सभी नेताओं ने औपचारिक रूप से राजीव गांधी भवन में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। नेताओं का कहना है कि वे लंबे समय से भाजपा सरकार की आदिवासी नीतियों से असंतुष्ट थे।

कांग्रेस में शामिल होने के बाद Maheshbhai Machhar ने भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि राज्य में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और आदिवासी समुदाय को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। उनका कहना है कि अब वे कांग्रेस के माध्यम से अपने समाज के मुद्दों को मजबूती से उठाएंगे।

इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस ने आदिवासी क्षेत्रों में बढ़ती नाराजगी का संकेत बताया है। पार्टी के मीडिया संयोजक Dr Manish Doshi ने आरोप लगाया कि सरकार ने आदिवासी समाज को वन अधिकार, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा है। उन्होंने छोटा उदयपुर में कथित फर्जी कार्यालय और दाहोद में ट्राइबल सब-प्लान फंड में गड़बड़ी जैसे मुद्दे भी उठाए।

इसी बीच कांग्रेस ने Navsari में अपना कमिटमेंट डॉक्यूमेंट जारी किया, जिसे पार्टी ‘पीपल्स मैनिफेस्टो’ बता रही है। पार्टी का दावा है कि यह दस्तावेज़ डोर-टू-डोर कैंपेन और ‘जन मंच’ के माध्यम से जनता से सीधे संवाद के आधार पर तैयार किया गया है।

इस मैनिफेस्टो में स्थानीय स्तर पर जवाबदेही बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसमें सड़कों के निर्माण पर ‘जनता ऑडिट’, नगर स्कूलों का आधुनिकीकरण, 24 घंटे वार्ड स्तर पर स्वास्थ्य केंद्र और महिलाओं के लिए फ्री सिटी बस सेवा जैसी घोषणाएं शामिल हैं।

दाहोद में आदिवासी नेतृत्व को अपने पक्ष में जोड़कर और नवसारी में स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर कांग्रेस खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। वहीं, भाजपा के लिए यह घटनाक्रम एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है कि आदिवासी क्षेत्रों में उसकी पकड़ कमजोर हो सकती है।

आने वाले समय में गुजरात की राजनीति और अधिक रोचक होने के संकेत मिल रहे हैं, जहां आदिवासी वोट बैंक एक बार फिर निर्णायक भूमिका निभा सकता है।