सुनेत्रा पवार की शपथ पर सियासी बवाल, राजीव गांधी की मिसाल क्यों हो रही है वायरल?

Sunetra Pawar Oath Controversy | Rajiv Gandhi Oath Truth | सुनेत्रा शपथ विवाद


सुनेत्रा पवार की शपथ पर उठे सवालों के बीच राजीव गांधी की शपथ की चर्चा तेज। क्या इंदिरा गांधी की मौत के दिन ही राजीव गांधी बने थे PM? पूरी सच्चाई पढ़ें।


महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। अजित पवार के आकस्मिक निधन के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार ने राज्य के डिप्टी मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन यह फैसला राजनीतिक से ज्यादा भावनात्मक और वैचारिक बहस का विषय बन गया है। सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक सवाल उठ रहे हैं कि क्या मातम के बीच शपथ लेना उचित था।

अजित पवार की विमान हादसे में हुई मौत ने पूरे महाराष्ट्र को झकझोर कर रख दिया। एक तरफ परिवार और समर्थक गहरे शोक में थे, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी खड़ा हो गया कि एनसीपी के सबसे प्रभावशाली गुट की कमान अब कौन संभालेगा। पार्टी दो धड़ों में बंटी है, लेकिन अजित पवार गुट की पकड़ अब भी सबसे मजबूत मानी जाती है। ऐसे में नेतृत्व की निरंतरता बनाए रखने के लिए सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम बनाया गया।

सुनेत्रा पवार ने पति को श्रद्धांजलि देने के बाद बेहद भावुक माहौल में शपथ ली। हालांकि कांग्रेस नेता उदित राज सहित कुछ नेताओं ने इस फैसले पर सवाल खड़े किए और कहा कि मातम के दौरान शपथ समारोह को टाला जा सकता था। इसके जवाब में भाजपा ने कांग्रेस पर “गिद्ध राजनीति” करने का आरोप लगाया और कहा कि संवेदनशील मुद्दों पर भी राजनीति की जा रही है।

इसी बहस के बीच सोशल मीडिया पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का उदाहरण सामने आने लगा। कई यूजर्स ने दावा किया कि राजीव गांधी ने अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ ही घंटों बाद प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली थी। भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने भी इसी तर्क के आधार पर कांग्रेस को घेरा और पूछा कि जब तब किसी ने परंपरा की बात नहीं की, तो आज सुनेत्रा पवार के मामले में यह मुद्दा क्यों उठाया जा रहा है।

तथ्यों की पड़ताल करने पर सामने आता है कि 31 अक्तूबर 1984 को सुबह 9:20 बजे इंदिरा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उन्हें दोपहर करीब 2 बजे मृत घोषित किया गया और उसी दिन शाम लगभग 6 बजे राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। यह ऐतिहासिक तथ्य है और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है।

यही कारण है कि सुनेत्रा पवार की शपथ को लेकर उठ रहे सवालों की तुलना राजीव गांधी की शपथ से की जा रही है। समर्थकों का कहना है कि देश और राज्य की प्रशासनिक स्थिरता के लिए ऐसे फैसले कई बार तुरंत लेने पड़ते हैं, जबकि विरोधियों का तर्क भावनात्मक आधार पर टिका है।

फिलहाल यह बहस केवल एक शपथ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में विरासत, संवेदना और सत्ता संतुलन जैसे बड़े सवालों को भी सामने ला रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद राजनीतिक दिशा में क्या मोड़ लेता है।