देश चलाने के लिए लीडर चाहिए या ‘चीयरलीडर’?

रणघोष खास. वंदिता मिश्रा


लोकतंत्र में किसी नेता का चुनाव करने के लिए जनता/वोटरों के पास क्या विकल्प हो सकते हैं? वह कौन सा ‘टिपिंग पॉइंट’ होता होगा जहां से जनता किसी व्यक्ति विशेष को अपना नेता मान लेती होगी? संभवतया किसी नेता की ‘छवि’ वह पहलू है जिससे जनता को चुनाव करने में आसानी होती है।इस प्रक्रिया में मीडिया, ‘अफवाह’ और ‘सूचना’ के सही मिश्रण से किसी सामान्य नेता को भी जनता का विश्वास हासिल करने में मदद कर सकता है (जैसे किसी नेता को अवतार, संत या तपस्वी साबित करने के कारनामे) और इसी तरह से किसी विशेष गुण वाले नेता को हाशिये पर भी धकेला जा सकता है (जैसे किसी नेता को कमजोर, बचकाना, परिवारवादी और भ्रष्ट साबित करने के कारनामे)। भारत में मीडिया का संचालन बहुत बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने कर रहे हैं। जिनका अस्तित्व सिर्फ़ मीडिया में न होकर अन्य कई व्यापारिक गतिविधियों में भी होता है। सरकार के पास ईडी और सीबीआई जैसे ‘मज़बूत’ संस्थागत ढाँचे उपलब्ध हैं जिन्हें केन्द्रीय नेतृत्व अपने निजी फायदे के लिए कठपुतली या ‘तोते’ की तरह इस्तेमाल कर सकता है। अफवाह और सूचना, सोशल मीडिया के अंतर्निहित हथियार हैं। किसी अफवाह या झूठी सूचना की सोशल मीडिया में गैर-आनुपातिक बहुलता, पहले लॉन्च होने की काबिलियत और पहुँच ही उसे एक बड़े वर्ग के लिए ‘सत्य’ या ‘वास्तविक सूचना’ का आभासी एहसास दिला देती है। सोशल मीडिया में बहुलता में वही दल या नेता रह या दिख सकता है जिसके पास हाइटेक लेवियाथन कंपनियों के पेट भरने के लिए अत्यधिक धन की उपलब्धता हो। चूँकि ईडी और सीबीआई जैसे संस्थान सत्ता पक्ष के नेताओं को हाथ भी नहीं लगाते इसलिए धन की गैरआनुपातिक बहुलता सत्ता पक्ष के पास ही होती है। राजनैतिक पार्टियों को चंदा देने वाले बड़े धनपति ज्यादा से ज्यादा धन सत्ताधारी पार्टी को ही देते हैं। यह बात मेरे कहने के लिए नहीं छोड़ी जानी चाहिए कि वो ऐसा क्यों करते होंगे? ऐसे में, जो भी व्यक्ति नेता का रूप लेकर जनता के सामने उभरता है वह वास्तविक नेता भी हो सकता है और आभासी भी। एक बार उलझ चुकी जनता के सामने फिर से एक मौका होता है कि कैसे पहचाने कि कौन नेता वास्तविक है और कौन आभासी? यह इस ‘लिटमस टेस्ट’ पर निर्भर होता है कि नेता या किसी दल द्वारा किए गए वादे क्या थे? कोई नेता चुनाव पूर्व जो वादा करता है और उसे जिस सीमा तक निभाता है वह उसी सीमा तक ही वास्तविक नेता होता है उसका बाकी हिस्सा आभासी होता है जिसका निर्माण मीडिया और अफवाहें करती हैं। चुने जाने के बाद एक आभासी नेता हर दिन नए वादे करके पुराने वादों को भूलने के लिए अफवाहों के माध्यम से उलझने को बाध्य करता है। ये वही पुराने वादे हैं जिनके आधार पर उस नेता का ‘वास्तविक नेता’ के रूप में चयन हुआ था। हो सकता है, यह थ्योरी थोड़ा जटिल प्रतीत हो रही हो लेकिन उदाहरणों से यह आसानी से मस्तिष्क में बैठ जाएगी। लोकतंत्र में किसी भी संघर्ष को ‘छापामार’ लड़ाई के माध्यम से नहीं किया जा सकता। यह न ही मध्यकाल का दौर है और न ही जंगलों में चलने वाला नक्सलवादी आंदोलन। लेकिन स्वयं को ‘ईमानदार’ राजनीति का ‘अवतार’ समझने वाले अरविन्द केजरीवाल शायद यही समझ रहे हैं। अन्ना आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाने वाले अरविन्द केजरीवाल आरोप लगाकर भाग जाने वाले लड़ाई के राजनैतिक प्रतिनिधि बनकर उभरे हैं। केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन की शुरुआत में ही दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर तमाम भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। राजनैतिक दल, आम आदमी पार्टी, बना लेने के बाद और दिल्ली विधानसभा चुनाव से पूर्व यह ‘वादा’ किया कि शीला दीक्षित के खिलाफ सभी मामलों की जांच होगी, उन्हें जेल भेजा जाएगा, साथ ही यह दावा भी किया कि उनके पास ‘पर्याप्त’ सबूत उपलब्ध हैं।  केजरीवाल ने शीला दीक्षित सरकार पर कई आरोप लगाए थे, लेकिन 2013 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने से लेकर 2020 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने तक केजरीवाल ने इस तथाकथित भ्रष्टाचार के मामले में कोई कार्रवाई नहीं की। एक जागरूक नागरिक होने के नाते मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि अरविन्द केजरीवाल के पास ‘पर्याप्त’ सबूत जैसा कुछ नहीं था। साथ ही यह भी कि उन्होंने जो ‘वादा’ किया था वह पूरी तरह झूठ निकला। अरविन्द केजरीवाल ने दावा करते हुए वादा भी किया था कि उनके पास मुकेश अंबानी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और सत्ता में आते ही वो इसे उजागर करेंगे, लेकिन उन्होंने नहीं किया, उनका वादा झूठा निकला। केजरीवाल ने भरतीय जनता पार्टी के नेता नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया, स्वर्गीय अरुण जेटली पर भीडीडीसीए  में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए लेकिन जब इन दोनों नेताओं ने अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया तो मुख्यमंत्री केजरीवाल ने माफी मांग ली। पंजाब के नेता विक्रम मजीठिया के खिलाफ ड्रग्स तस्करी के आरोप लगाए और कहा कि उनके पास ‘पर्याप्त’ सबूत हैं। लेकिन जब मजीठिया द्वारा केजरीवाल को मानहानि का सम्मन भेजा गया तो एक बार फिर से केजरीवाल ने माफी मांग ली। ऐसे ही आरोप कांग्रेसी नेताओं प्रणव मुखर्जी (जो बाद में देश के राष्ट्रपति भी बने) और पी चिदंबरम पर भी लगाए, मंच से खड़े होकर अपमानजनक भाषा में उनके बारे में बोला लेकिन जब सत्ता हाथ आई तो किसी के खिलाफ कोई भी मामला नहीं चलाया। जनता के बीच भ्रष्टाचार विरोधी अवतार की छवि बनाने की लगातार कोशिश में केजरीवाल ‘आरोप लगाओ और पीछे हट जाओ’ के फॉर्मूले पर चलते रहे। कभी किसी का भ्रष्टाचार साबित नहीं कर पाए। केजरीवाल ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शुरू किया था इसलिए लगातार वह विभिन्न नेताओं और उद्योगपतियों के भ्रष्टाचार की ही बात करते थे। लेकिन लगता है कि अरविंद केजरीवाल की ईमानदार छवि दूसरों को ज़बरदस्ती बेईमान साबित करने से ज़्यादा जुड़ी हुई प्रतीत होती है। इससे उन्हें खुद की कमियों को छिपाने के मौक़े आसानी से मिल जाते हैं। शायद सबकुछ सोचा समझा और टार्गेटेड था। दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनका मुकाबला कांग्रेस की शीला दीक्षित और भाजपा से था। जनता को अपनी तरफ करने का एक ही तरीका उन्हें समझ आया कि सभी मजबूत पक्ष के नेताओं के खिलाफ सनसनीखेज आरोप लगाओ, उन्हें मीडिया में जाकर प्रचारित करो, जनता में सबको भ्रष्टाचारी साबित कर दो और जब स्वयं ‘फँसने’ लगो तो घर जाकर माफी मांग लो। जनता के बीच ‘अफवाहों’ के माध्यम से अन्य नेताओं की बुरी छवि को लंबे समय के लिए बिठा दिया गया और इस तरह सत्ता का ‘लक्ष्य’ हासिल हो गया। हो सकता है कि मोहल्ला क्लिनिक, सरकारी स्कूलों के हालात बेहतर हो गए हों, लेकिन मेरा मानना है कि कोई नेता सत्ता हासिल करने के प्रयास में जिन वादों का इस्तेमाल मुख्य रूप से करता है जनता को उस नेता का आकलन उन्हीं सनसनीखेज वादों और दावों पर करना चाहिए। क्योंकि ये वही वादे/दावे होते हैं जिनसे एक स्थापित सरकार पहले गिराई जाती है और दूसरी सरकार बनाई जाती है।विकास संबंधी कार्य देश की सभी सरकारों का एक नियमित काम होता है, कोई सरकार कम काम करती है कोई थोड़ा ज़्यादा। बनावटी कहानियाँ बनाकर उन्हें सोशल मीडिया पर शेयर करना बचकाना ही नहीं आपराधिक भी है। वर्ष 2019 में लोकायुक्त ने राज्य विधानसभा से सभी विधायकों को उनकी संपत्ति और देनदारियों की वार्षिक घोषणा करने के लिए नोटिस जारी करने के लिए कहा था। जनलोकपाल और भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर राजनीति की गंगा बनने की कोशिश करने वाली आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल को चाहिए था कि वो दिल्ली लोकायुक्त के आदेश का पालन करते ताकि भ्रष्टाचार पर उनका रुख साफ समझ आता। झूठ और अफवाह तो मानो केजरीवाल जी के लिए ‘हार्ड करन्सी’ बन चुके हैं जब चाहो मार्केट में उड़ा दो लोग सच समझ कर लूट लेंगे। उन्होंने दावा किया था कि उनके रोजगार पोर्टल से 10 लाख रोजगार दिए गए जबकि द हिन्दू  की एक रिपोर्ट के अनुसार 1 मई 2022 तक मात्र 12,588 रोजगार ही दिए गए। मतलब उन्होंने अपने काम को 100 गुना झूठ के साथ पब्लिक डोमेन में फेंक दिया। अब उनका नया ‘वादा’ है 20 लाख रोजगार देने का। अंदाजा लगाया जा सकता है कि असल में कितने लोगों को रोजगार मिलने वाला है। केजरीवाल जी पंजाब चुनावों के पहले मोहाली में एक और ‘वादा’ करके आए थे कि शारीरिक प्रशिक्षण प्रशिक्षक (पीटीआई) के खाली पड़े सैकड़ों पदों की भर्ती की प्रक्रिया सरकार बनने के तुरंत बाद प्राथमिकता से की जाएगी। जबकि वादे की असलियत यह है कि अब वे शिक्षक आम आदमी पार्टी की नई पंजाब सरकार में लाठियाँ खा रहे हैं। एक तरफ बेरोजगार लाठियाँ खा रहे हैं तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी द्वारा करोड़ों रुपया बैनर, पोस्टर, टीवी और समाचार पत्रों में विज्ञापन पर उड़ाया जा रहा है। सच कहते हैं कि अरविन्द केजरीवाल कि वो ‘राजनीति बदलने आए हैं’। पर ये कैसा बदलाव है?

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