बस एक अनुरोध है.. किसानों को खलनायक तो मत बनाइए..

सरकार किसानों की बात सुनेगी या नहीं और जो सुनेगी तो मानेगी या नहीं। किसान आंदोलन का असली खतरा इसी बात से नहींहै। अभी यह सवाल अहम नहीं। अहम सवाल यह है कि आंदोलन के लिए जुटे लोगों को अभी ‘किसान’ माना जायेगा या नहीं। छवियों को गढ़ने-बिगाड़ने इस युद्ध में निहत्थे खड़े किसानों को कहीं ‘खालिस्तानी, पाकिस्तानी, भाड़े पर आये फर्जी लोग’ तो नहीं मान लिया जायेगा ? इस आंदोलन से क्या होगा ? क्या अंत में सरकार किसानों की बात सुनेगी ?…’ जमीन से उठती आवाजों को मुख्यधारा की मीडिया में जगह देने-दिलवाने के रोमानी संकल्प के साथ पत्रकारिता के पेशे में दाखिल हुए एक साथी ने फोन पर पूछा है। क्या जवाब हो सकता है इस सवाल का आज की तारीख में ? सवाल पूछने वाले पत्रकार साथी की आवाज में आशंका है, हाल के धरना-प्रदर्शनों के हश्र को याद करके लगभग नाउम्मीदी की सरहदों को छूने वाला भाव ! और, सवाल का जवाब तलाशने वाला पसोपेश में है। सरकार के तेवरों से दिख रहा है कि तीन कृषि-कानूनों के खिलाफ आंदोलन करने वाले पंजाब और हरियाणा के किसानों को अपनी संघर्ष की कहानी के नायक की बजाय रातो-रात ‘ खलनायक ना बना दिया जाए। खलनायक की बात कोई सुनता है भला?। गौर करिए कुछ दिन पहले – प्रसार-संख्या के लिहाज से देश का नंबर वन अखबार ने दिल्ली कूच करते किसानों के जत्थे के बारे में सुर्खी लगायी थी। ‘किसानों के जत्थे में लगे पाक जिंदाबाद के नारे। समाचार की पहली ही पंक्ति ये अखबार पाठकों को बता रहा है : ‘दिल्ली घेराव के लिए जा रहे किसानों की एक आपत्तिजनक वीडियो वायरल हो गई है जिसमें पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं। यह वीडियो पानीपत जिले के समालखा के पास हल्दाना बार्डर या मुरथल और बढ़ी के बीच नाके का होने का अनुमान है।’ वीडियो ठीक-ठीक कहां का है-सेकेंड के सौवें हिस्से में चीजों की लोकेशन बताने वाले इस इंटरनेटी समय में इस समाचार को लिखने वाले देश के नंबर वन अखबार को इस बात की खबर नहीं। नारे लगाने वाला शख्स कौन था— इस अखबार को पता नहीं। जिस व्यक्ति (विधायक सिमरजीत सिंह बैंस) के सामने नारे लगने की बात समाचार में कही गई है, उसे इस बात को मानने-नकारने से कोई मतलब ही नहीं। जिस पुलिस अधिकारी के सामने नारे के लगने और साक्षी के तौर पर विधायक के उसके सामने होने की बात समाचार में कही गई है, वह पुलिस अधिकारी मानते ही नहीं कि किसी ने सचमुच ऐसे नारे लगाये भी थे। मतलब ऊपर के समाचार से निकलता कुल समाचार यह कि समाचार की बुनियादी बातों की रत्ती भर खबर ही नहीं लेकिन अखबार ने सुर्खी लगा दी कि किसानों के जत्थे में लगे पाक जिन्दाबाद के नारे ! अखबार पढ़ने वाले लाखो पाठक शीर्षक पढ़कर समाचार को सच मान लेंगे और पाठकों में से शायद ही किसी-किसी कि नजर जायेगी कि समाचार में एक जगह ये भी लिखा है कि पाकिस्तान समर्थक नारे लगने की बात की ‘पुष्टि नहीं हो सकी है ’ । शायद ही किसी पाठक के मन में सवाल उठेगा कि जब किसी बात की पुष्टि ही ना हो सकी तो समाचार कैसे बन गया। बिना पुख्ता साक्ष्य के कोई बात अफवाह हो सकती है, समाचार नहीं । इसलिए किसान अगर छवियों के इस युद्ध में विजयी होते हैं तो उन्हें किसान मानकर उनकी बात सुनी जायेगी। उनके विरोध-प्रदर्शन को वैध और लोकतांत्रिक माना जायेगा। और, जो छवियों के युद्ध में किसान हार गये तो फिर अगले बहुत से वक्तों के लिए उनका मुद्दा हार जायेगा।

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