टिकट पर ‘एक चेहरे’ का दबदबा या संगठन की सहमति? रेवाड़ी-धारूहेड़ा में फैसले ने खड़े किए बड़े सवाल

तीन दिन की बैठकों के बाद भाजपा ने विनीता पीपल और अजय जांगड़ा पर लगाई मुहर; दावेदारों की लंबी कतार के बावजूद अंतिम फैसले पर उठे सवाल


तीन दिन तक चली मैराथन बैठकों और गहन मंथन के बाद भाजपा ने आखिरकार रेवाड़ी नगर परिषद और धारूहेड़ा नगर पालिका चेयरमैन पद के लिए अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया। रेवाड़ी से पूर्व चेयरमैन विनीता पीपल और धारूहेड़ा से निवर्तमान उपप्रधान अजय जांगड़ा को टिकट देकर पार्टी ने चुनावी रण में अपने पत्ते खोल दिए हैं। दोनों ही नाम केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह के करीबी माने जाते हैं, जिससे इस फैसले ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

अब मुकाबला सीधा दिखाई दे रहा है—रेवाड़ी में कांग्रेस की निहारिका चौधरी के सामने विनीता पीपल और धारूहेड़ा में कुमारी राज के सामने अजय जांगड़ा। लेकिन क्या यह मुकाबला इतना सीधा है, या इसके पीछे कई परतें छिपी हुई हैं?

रेवाड़ी में टिकट की दौड़ आखिरी समय तक बेहद दिलचस्प रही। डॉ. हर्षा निंबल और उषा कांटीवाल संगठन की पसंद के चेहरे बनकर उभरीं और उन्होंने विनीता पीपल को कड़ी चुनौती दी। सवाल यह उठता है कि जब संगठन के भीतर ही मजबूत विकल्प मौजूद थे, तो आखिर अंतिम क्षणों में बाजी कैसे पलट गई? क्या यह फैसला पूरी तरह संगठन का था या फिर किसी एक प्रभावशाली चेहरे की पकड़ भारी पड़ गई?

भाजपा को कुल बयालीस आवेदन मिले थे—रेवाड़ी से पच्चीस और धारूहेड़ा से सत्रह। अंत में पांच नामों पर चर्चा सिमट गई, लेकिन टिकट सिर्फ दो को मिला। ऐसे में बाकी दावेदारों की भूमिका और उनकी अनदेखी पर भी सवाल उठना लाजिमी है। क्या चयन प्रक्रिया पारदर्शी थी या फिर समीकरणों का खेल चला?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राव इंद्रजीत सिंह एक बार फिर पूरे संगठन पर भारी पड़े हैं?
पिछले चुनावों का इतिहास भी इसी ओर इशारा करता है। 2020 में पूनम यादव को टिकट मिला, 2019 और 2024 के विधानसभा चुनाव में भी उन्हें खुली छूट मिली थी। अब 2026 के नगर निकाय चुनाव में भी वही पैटर्न दोहराया गया है। क्या यह संयोग है या पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन की सच्चाई?

विनीता पीपल का राजनीतिक सफर भी इस समीकरण को मजबूत करता है। 2014 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुईं, 2016 में भाजपा के समर्थन से चेयरमैन बनीं। इस बार सीट एससी महिला के लिए आरक्षित है और वे जाटव समाज से आती हैं। उनका पारिवारिक और राजनीतिक आधार भी लंबे समय से मजबूत रहा है।

दूसरी ओर कांग्रेस ने भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरते हुए रेवाड़ी से निहारिका चौधरी और धारूहेड़ा से कुमारी राज को उम्मीदवार बनाया है। निहारिका का परिवार लंबे समय से कांग्रेस से जुड़ा हुआ है और स्थानीय स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।

इनेलो ने भी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। प्रदेश प्रवक्ता रजवंत डहीनवाल ने अपनी पत्नी डॉ. मीनू डहीनवाल को निर्दलीय मैदान में उतारने का ऐलान किया है। वहीं महिला कांग्रेस की पूर्व प्रदेश महासचिव सुचित्रा ने भी चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं।

अब असली तस्वीर क्या बनेगी?
क्या यह चुनाव सीधा मुकाबला रहेगा या वोटों का बिखराव किसी तीसरे को फायदा पहुंचाएगा?
क्या निर्दलीय उम्मीदवार समीकरण बदल देंगे?
और सबसे अहम—क्या जनता चेहरे देखेगी या काम?

वार्ड स्तर पर भी भाजपा ने बड़ा दांव खेला है। 32 वार्डों में उम्मीदवार उतारे गए हैं, जिनमें 22 नए चेहरे शामिल हैं। 10 पुराने पार्षदों पर फिर भरोसा जताया गया है। पूनम यादव के परिवार को इस बार झटका दिया गया है, जबकि कई पुराने नामों को दोबारा मौका मिला है।

अब चुनावी जमीन पूरी तरह तैयार है, लेकिन असली फैसला जनता के हाथ में है।
क्या इस बार भी वही पुराना समीकरण चलेगा, या फिर रेवाड़ी-धारूहेड़ा की जनता कोई नया राजनीतिक संदेश देगी?