कैसे प्रेम और निर्ममता, करुणा और निर्दयता, की किरणें हृदय के लेंस से होकर एक ही बिंदु पर मिल सकती हैं

होई जबै द्वै तनहुँ इक


मौत के आर पार ( अध्याय 8 )


Babuरणघोष खास. बाबू गौतम


    मैं उसे अनदेखा करके गाड़ी चला रहा था। उसकी उपस्थिति का साक्षी ना बनने का यह उपक्रम मुझे संतोष दे रहा था। जबकि वह सबको दिखने की कोशिश कर रहा था। गनीमत है किसी ने  हमें नहीं देखा। फाइव गार्डेन के सबसे सुनसान गार्डेन के दूसरी ओर मैंने गाड़ी पार्क की। मेरे लिए मेरे घर से दूरतम जो छोर था, वही दूसरी ओर था। उसने फिर एक गुलाँची मारी, ओर गाड़ी से बाहर। अपनी पटरी- गाड़ी मिलते ही सरपट निकल कर बेंच के पास जा कर जम गया। धूप को ऐसे देखते हुए जैसे कोई बच्चा बारिश में नहाता है। मेरे पास पहुँचते ही शुरू हो गया।

“अच्छा होगा आप ये माथे के बल निकाल लें। मैं भी अकसर भन्नाया रहता था, जब तक बावरी मेरी ज़िंदगी में नहीं आई थी। कुछ भी नहीं था मेरे पास जिस दिन वह मेरे घर में आई। उसके कदम रखते ही सब कुछ बदल गया।”

“देखिए , बेहतर होगा तुम मुझे बस मतलब की बात बताओ। मैं कोई खाली आदमी नहीं हूँ।”

वह ज़ोर से हँसा। शायद यह उसके भड़कने का तरीका था। 

“ मैंने आपको नहीं बुलाया था। याद करो। पैसे के लिए खीझ रहे हो तो मत दो। क्या मतलब की बात बताऊँ? कि मैंने बावरी को कैसे मारा? उससे क्या होगा? बात फिर भी अधूरी ही रहेगी। लो बताता हूँ। मैंने उसके मुँह पर तकिया रख कर जब उसकी साँस रोकी तो मेरा मन उसके प्यार से लबालब था। वह ज़रा सी छटपटाई। पर मेरी नज़र कहीं ओर थी। जब उसकी साँस बंद हो गयी तो मैंने जी भर कर उसे देखा। मुझे लगा वह चैन से सो रही है। एक हल्की सी मुस्कान थी उसके चेहरे पर। जैसे कह रही थी, ” आख़िर नहीं माना ना मेरा कहा। मैं जानती हूँ, बहुत प्यार करते हो मुझ से।”  उसकी साँस उफन आई थी। वह रूका। रूक कर बोला:

” ऐसा मैं सोच रहा था, बावरी के मुँह पर तकिया रखने के बाद। मगर जो हुआ, वह कल्पना से परे है। उस दिन से उसके लिए मेरे मन में प्यार बढ़ता ही जा रहा है। यह धूप जब मेरे चेहरे पर गिरती है तो मुझे लगता है बावरी सिंगर कर मेरे सामने खड़ी है। और मैं मुस्कुराता रहता हूँ, उसे देख देख कर। रात आती है तो लगता है वह मेरे पहलू में आकर सो गयी है। क्या होगा यह बता देने से जब तक तुम नहीं अनुभव कर पाओगे वह प्यार जिसके तुम केवल सपने ले सकते हो , और मैंने जिसे जिया है?”

वह दो पल के लिए फिर ठहरा।

“उस प्यार को समझे बिना, कभी भी नहीं समझ पाओगे कि कैसे प्रेम और निर्ममता, करुणा और निर्दयता, की किरणें हृदय के लेंस से होकर एक ही बिंदु पर मिल सकती हैं …….कहानी लिखते हो?….. तो कहानी जीना सीखो.”

मेरा कलेजा धक से रह गया।  मैं फटी आँखों से उसे देखते हुए बुदबुदाया, “तुम्हें कैसे पता मैं कहानियाँ लिखता हूँ?”

उसने अनसुना कर दिया।

“ अब तुम जाओ, और कोशिश करो मेरे पास नहीं आने की। आओ तो चाहे पैसे भी मत लेकर आना। बस, हिसाब रखना। पैसे तो तुम मुझे दोगे ही। अगर कल आओ तो यह सोच कर आना कि मैं तुम्हें पहले जी भर कर मेरे और बावरी के प्यार की कहानी सुनाऊँगा। क्योंकि उसके बिना, बावरी की मौत की कहानी ना मैं बता पाऊँगा और ना तुम समझ पाओगे….. जब वक़्त आता है, प्यार मौत को लाँघ जाता है। आर पार चला जाता है।”

मैं जब बेंच से उठा तो मेरे पाँवों में कंपन था, और दिमाग़ में कुहराम।

“ यहीं आना कल। मैंने आज तक कोई कहानी नहीं पढ़ी है।”

उसकी आवाज़ सुन कर मैं मुड़ा नहीं।