चुनाव में आप वहीं लिखिए जो पैकेज तय करता है, नहीं तो कीमत चुकाने के लिए तैयार रहे

 किसी भी छोटे- बड़े चुनाव में पैकेज के नाम पर मीडिया एक जिंदा लाश की तरह चुनाव की कवरेज करता है। इसलिए इस पर आंख बंद कर भरोसा करने की बजाय इस मीडिया को परखिए। इम्तहान पत्रकार दे रहा है और प्रश्न पत्र की सेटिंग मालिक कर रहे हैं। चुनाव मीडिया के खेल को समझने का बेहतरीन दौर होता है।  इस चुनाव में न्यूज चैनल और अखबार विपक्ष की हत्या करेंगे। ऐसा नहीं करोंगे तो धमकियां मिलेगी। विपक्ष भी अपनी हत्या होने देगा.वह अगर मीडिया से नहीं लड़ेगा तो आपके भीतर के विपक्ष को नहीं बचा पाएगा। आप देखिए कि विपक्ष का कौन नेता चुनाव में लाश बने इस मीडिया के लिए लड़ रहा है. इस बार अगर आप नागरिकता के इस इम्तहान में हारेंगे तो अगले पांच साल ये मीडिया अपने कंधे पर आपकी लाश उठाकर नाचेगा।  अपवादों से कुछ मत देखिए. इस देश में हमेशा कुछ लोग रहेंगे।. जनता क्या कर सकती है? कायदे से उसे पहली लड़ाई खुद को लेकर लड़नी चाहिए। उसे देश का हर चुनाव अपने लिए लड़ना होगा।  अखबारों को गौर से देखे। दूसरे अखबारों को भी उसी निर्ममता के साथ देखे। किस पार्टी का विज्ञापन सबसे ज्यादा है। किस पार्टी के नेताओं का बयान सबसे ज्यादा है। अखबारों के पत्रकार नेताओं के दावों को अपनी तरफ से जांच कर रहे हैं या सिर्फ उन्हें जस का तस परोसने की चतुराई कर रहे हैं। बात बार और देर की नहीं बात है कि मुद्दों को रखने की जिस पर नेता जवाब दें. कि नेताओं के श्रीमुख से निकले बकवासों को मुद्दा बनाए।  आपको पता चलेगा कि आने वाला भारत कैसा होने जा रहा है.