केंद्र सरकार से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर फसलों की खरीद की गारंटी के लिए कानून बनाने की मांग करते हुए हजारों किसानों ने दिल्ली कूच किया है। वे पंजाब से दिल्ली की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन प्रशासन ने उन्हें रोकने के लिए कई जगह बैरिकेडिंग की है और फिलहाल हिंसक संघर्ष चल रहा है। इससे पहले सोमवार रात को किसानों और केंद्र सरकार के बीच लंबा मंथन चला, लेकिन बात नहीं बन पाई। इस बीच सवाल यह भी उठ रहा है कि MSP की मांग सरकार लागू क्यों नहीं कर देती? दरअसल यह इतना आसान नहीं है। यदि इसे लागू किया गया तो अर्थव्यवस्था और महंगाई दोनों मोर्चों पर इसका गंभीर असर हो सकता है।
यही वजह है कि किसानों की तमाम मांगों पर सहमति जताने के बाद भी सरकार MSP को लेकर हिम्मत नहीं जुटा रही है। किसानों के सभी उत्पादों के लिए MSP पर खरीद की कानूनी गारंटी देना कितना महंगा होगा, यह समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डाल सकते हैं। पहला, वित्त वर्ष 2020 के आधार पर समस्त कृषि उपज का कुल मूल्य 40 लाख करोड़ रुपये है। इसमें डेयरी, खेती, बागवानी, पशुधन और एमएसपी फसलों के सभी उत्पाद शामिल हैं। दूसरा, वित्त वर्ष 2020 के आधार पर ही एमएसपी वाली फसलों की उपज का कुल बाजार मूल्य 10 लाख करोड़ रुपये है।
यदि एमएसपी वाली फसलों की ही MSP पर खरीद की कानूनी गारंटी सरकार दे तो यह बहुत ज्यादा है। फिलहाल देश में 24 फसलों पर एमएसपी लागू है। इन में से 7 अनाज ज्वार, बाजरा, धान, मक्का, गेहूं, जौ और रागी हैं, जबकि 5 दालें, मूंग, अरहर, चना, उड़द और मसूर भी शामिल है। बीते कुछ सालो में देश में इस बात को इतना दोहराया गया है कि लगता है कि किसानों की फसलों को MSP पर खरीदना खेती की व्यवस्था का अनिवार्य अंग है। ऐसा कहा जाता है कि इसके बिना किसानों को लाभ हो ही नहीं सकता।
हालांकि, यह सच्चाई से बहुत दूर है। गौर करने वाली बात है कि वित्त वर्ष 2020 में एमएसपी पर फसलों की कुल खरीद 2.5 लाख करोड़ रुपये के करीब रही जो कुल कृषि उपज का मात्र 6.25 फीसदी और एमएसपी फसलों की खरीद का सिर्फ 25 फीसदी है। अब सवाल उठता है कि अगर एमएसपी गारंटी कानून लागू करती है तो क्या होगा। स्पष्ट है कि किसानों की एमएसपी वाली फसलों की खरीद 2020 के आधार पर करने के लिए सालाना कम से कम 10 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय उठाना पड़ेगा।
अगर, सरकार किसानों की मांग मान लेती है कि 10 लाख करोड़ की लागत उठानी पड़ेगी। तो अब सवाल उठता है कि पैसा कहां से आएगा? क्या हम, एक नागरिक के रूप में, बुनियादी ढांचे और रक्षा खर्च में कटौती करने या प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से अधिक टैक्स वसूलने के विचार से सहमत होंगे? बता दें कि सरकार ने अंतरिम बजट में बुनियादी ढांचे के लिए इसी रकम के बराबर (11.11 लाख करोड़ रुपये) आवंटित किए हैं। पिछले सात वित्तीय वर्षों में हमारे बुनियादी ढांचे पर किए गए वार्षिक औसत व्यय (2016 और 2023 के बीच) 67 लाख करोड़ रुपये रहा है , जो 10 लाख करोड़ रुपये से बहुत कम नहीं है। लिहाजा, सार्वभौमिक एमएसपी मांग का कोई आर्थिक या राजकोषीय अर्थ प्रतीत नहीं होता है, और यह सरकार के खिलाफ एक राजनीति से प्रेरित तर्क सा दिखता है।