शुक्रवार को ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने घोषणा की थी कि व्यापारिक जहाजों के लिए रास्ता पूरी तरह खुला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इसका स्वागत किया, लेकिन चंद मिनटों बाद ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर समझौता होने तक अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी जारी रहेगी। इसे ‘धोखा’ करार देते हुए ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने शनिवार को जवाबी कार्रवाई की और चेतावनी दी कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की ओर आने वाले किसी भी जहाज को दुश्मन का सहयोगी मानकर निशाना बनाया जाएगा।
ईरानी नौसेना की इस आक्रामकता की चपेट में भारत के दो मर्चेंट जहाज (एक टैंकर और एक कंटेनर पोत) भी आ गए। ब्रिटिश सैन्य संस्था UKMTO के अनुसार, ईरानी गनबोट्स ने एक टैंकर पर फायरिंग की, जबकि एक अन्य कंटेनर जहाज पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ। इस घटना ने भारत को नाराज कर दिया है और भारत सरकार ने तुरंत ईरानी दूत को तलब कर सख्त विरोध दर्ज कराया है।
भारत अपनी कच्चा तेल जरूरतों का लगभग 85% आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा सऊदी अरब और यूएई से इसी संकरे रास्ते (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) के जरिए आता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत 28 फरवरी से जारी इस नाकेबंदी और भविष्य के लंबे संकट को झेलने में सक्षम है? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई ‘अनौपचारिक मंत्री समूह’ (IGoM) की उच्च स्तरीय बैठक में भारत की तैयारियों का खाका पेश किया गया।
सरकार के पास वर्तमान में कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और एटीएफ (हवाई ईंधन) का 60 दिनों से अधिक का भंडार मौजूद है। इसके अलावा एलएनजी (LNG) का 50 दिन और एलपीजी (LPG) का 40 दिन का स्टॉक सुरक्षित है। इसमें भूमिगत गुफाओं में रखा गया रणनीतिक रिजर्व भी शामिल है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिकी देशों से तेल और गैस की आपूर्ति सुरक्षित कर ली है। अप्रैल और मई 2026 के लिए आयात की जरूरतें पहले ही पूरी की जा चुकी हैं, जिससे तत्काल किल्लत का खतरा टल गया है।
युद्ध की शुरुआत (28 फरवरी) से अब तक भारत के 8 जहाज (MT शिवालिक, MT नंदा देवी, जग वसंत आदि) सफलतापूर्वक इस युद्धग्रस्त क्षेत्र को पार कर चुके हैं। भारत अब तक तेहरान के साथ सीधे संवाद के जरिए अपने जहाजों को सुरक्षित निकालने में सफल रहा है।
भले ही भारत के पास 2 महीने का बैकअप हो, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें अस्थिर हो गई हैं। तेल की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर भारत में महंगाई और माल ढुलाई की लागत को प्रभावित करता है।
भारत वर्तमान में वेट एंड वॉच की नीति अपना रहा है। एक तरफ जहां रक्षा और पेट्रोलियम मंत्रालय आपूर्ति श्रृंखला को वैकल्पिक रास्तों से जोड़ने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत कूटनीतिक रास्तों से ईरान पर दबाव बना रहा है कि वह व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाना बंद करे। फिलहाल, भारत के पास अगले दो महीनों का सुरक्षा कवच है, लेकिन संकट लंबा खिंचने पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारत की चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।