तो जाओ तुम्हें मेरी चनौती है कि इस कहानी को लेकर तुम जो भी पूर्वानुमान लगाओगे, गलत निकलोगे

होई जबै द्वै तनहुँ इक


अहम् ब्रह्मास्मि (अध्याय 14)


Babuरणघोष खास. बाबू गौतम 

पर इतना सरल नहीं था। श्रेष्ठता के अपने तकाज़े होते हैं, अपनी मर्यादा होती है।  ईसर को पता था, उसे अपने देवत्व से च्युत होना पड़ सकता है। प्रजनन- प्रथम-परंतु। ब्रह्मा जी जानते थे, इसलिए प्रेम की डोर का दूसरा सिरा वहाँ बाँधा है, जहाँ से वह कभी नहीं खुल सकती है।

देवलोक में बात पहुँची; शिव के मरुधरा-पुत्र ईसर एक ईंधन तोड़ती कन्या के मोहपाश में बँध कर स्वत्व गँवा बैठे हैं। धन्यवाद नारद मुनि।

इंद्र की भृकुटी नीचे उतरी। कोई था जो नारी मन को आकर्षित करने में उन्हें चुनौती दे रहा था। कामदेव के मुख पर मुस्कान आयी। केवल ब्रह्मा जी से आशा थी।

ब्रह्मा जी से मुझे याद आया, बोल-ब्याह का बोल – ‘बिरमा जी नै मान कै पकड्यो थारो हाथ।’ मैं दत्तचित होकर सुनने लगा। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि एक सुनसान से गार्डेन में, एक ऐसे अर्धकाय से, जिस पर कोई दृष्टि तक नहीं डालेगा, मैं अपने जीवन की सबसे अद्भुत कहानी सुन रहा हूँ।

वह अनवरत बोलता गया।

हालांकि ईसर अपना देवत्व गँवाने का मन बना चुके थे। पर वे देवलोक में अपने प्रेम पर होने वाले उपहास और निंदा को लेकर चिंतित थे। गौरा को पाने का दृढ़ निश्चय कर ब्रह्मलोक पहुँचे। यह कहते हुए उसने मेरी ओर देखा। “देखो मित्र, मैं फिर स्पष्ट कर दूँ, यह सब मेरे लिए एक कथा है। मैं भाग्य या विधि के विधान में बिल्कुल भी विश्वास नहीं करता हूँ। मैं तुम्हें केवल अपने शब्दों में वह सब बता रहा हूँ जो बावरी ने मुझे सुनाया था। मुझसे पूछो तो हम बॅक्टीरिया के जीवन और विकास की अरबों साल लंबी कहानी के इस वर्तमान  एपीसोड के नायक हैं।” उसने हँस कर अपने वैज्ञानिक ज्ञान का स्वत: अनुमोदन किया।

फिर धूप को देखने लगा। “बस अंतर यह है कि जब वह सुनाती तो बीच बीच में अपने जादुई सुर में गाती थी- “थे ईसर म्हें गोरा भंवर जी!”

ब्रह्मा जी ने कहा:

” देखो शिव के धरापुत्र, आप अभी इस प्रेम प्रकरण से उपजने वाले यथार्थ को नहीं देख पा रहे हैं। जो अवश्यंभावी है, वह, मुझे दिखाई दे रहा है। तुम्हारा विवाह होगा उस कन्या से, अवश्य होगा। मेरा काम है प्रजनन को प्रोत्साहित करना और नये संयोग, नई जाति पैदा करना। अगर तुम और तुम्हारा देवत्व इस प्रयास में बलि भी चढ़ते हैं तो भी यह मानव जाति के लिए शुभ ही होगा। परन्तु इस मार्ग में जो पीड़ा और अवसाद है, वह सहन करने की शक्ति तुम में है या नहीं, मैं नहीं जानता। मैं बस यह जानता हूँ तुम महादेव नहीं हो, केवल उनके धरापुत्र हो। धरती पर जन्मे देव हो तुम। मैं तुम्हें सावधान करना चाहूँगा कि शिव से जो तुम्हें अर्धदेवत्व मिला है उसे बचाने के लिए तुम्हें अपना आधा शरीर और उस कन्या का आधा जीवन देना होगा। तुम्हारे बचे हुए शरीर में एक दिन तुम्हारी उस स्त्री का  बचा हुआ जीवन समा जायेगा। स्त्री को अपने शरीर में आज तक केवल शिव धारण कर पाए हैं। मैंने भी आज तक अपने सृजन में जब जब यह प्रयोग किया है, मैं सफल नहीं हुआ हूँ। तुम्हारा आधा शरीर और उस स्त्री का आधा जीवन। यह मूल्य तुम्हें स्वीकार है तो जाओ, राजा इंद्र तुम्हें स्वीकृति देंगे। शेष घटनाक्रम समय के साथ उजागर होगा।”

ईसर ने ब्रह्मा जी के सामने नतमस्तक होकर उत्तर दिया:

“हे प्रजापति, यदि उस पावन किशोरी का सानिध्य कुछ पल के लिए भी मुझे मिले तो मैं अपना पूरा शरीर एवं देवत्व त्यागने के लिए तत्पर हूँ।”

ब्रह्मा जी ने जब ईसर को आशीर्वाद दिया तो उनके चेहरे पर एक विजेता कूटनीतिक की मुस्कान थी। जैसे कह रहे हों- “अहम्… अहम्… अहम् ब्रह्मास्मि !”

इसने फिर मेरा चेहरा निहारा।

“अब तो मैं जान ही गया हूँ कि तुम एक कहानीकार हो। यह भी जानता हूँ कि अपने आपको बहुत बुद्धिमान समझते हो। तो जाओ, तुम्हें मेरी चुनौती है कि इस कहानी को लेकर तुम जो भी पूर्वानुमान लगाओगे, ग़लत निकलोगे।”

मैंने अपने कथाकार होने के घमंड में उसकी चुनौती को मन ही मन स्वीकार कर लिया था। मैं भूल गया था, यही तो वह मुझसे चाहता है।

क्रमश जारी….

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