“पर्यावरण बचाणा सै तो घर घर म्ह पेड़ लगाओ, रुदन सुणो ये रो रो कहरे ना हमनै काट बगाओ”

विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में ऑन लाइन कवि सम्मेलन का आयोजन भूपसिंह भारती के संयोजन में गूगल मीट पर किया गया, जिसमें देश के भिन्न- भिन्न शहरों के नामचीन कवियों ने शिरकत की। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता प्राचार्य राजकुमार ‘जलवा’ ने की। हैदराबाद (तेलंगाना) से उस्मानिया विश्वविद्यालय की कला संकाय के पूर्व डीन प्रो0 धर्मपाल पीहल ने प्रदूषण पर अपनी रचना “धुवां उगलती चिमनियों का शहर किसको चाहिए, दमघोटू आबोहवा का कहर किसको चाहिए” सुनाकर दिनोंदिन बढ़ते प्रदूषण की हानियों को अपनी गजल द्वारा प्रस्तुत किया। वाराणसी (उत्तरप्रदेश) से प्रखर अम्बेडकरवादी  चिंतक, समीक्षक व साहित्यकार डॉ. देवचन्द्र भारती ‘प्रखर’ ने  ‘पेड़ों की पूजा’ शीर्षक अपनी रचना में “भक्ति करने वाले क्यों ये बात समझ पाए नहीं, पेड़ों की पूजा के बदले पेड़ क्यों लगाए नहीं” पढ़कर खोखले पाखण्डवाद पर चोट की। टोहाना से वरिष्ठ साहित्यकार विनोद सिल्ला ने अपनी रचना “दूषित हुई हवा वतन की, कट गए पेड़ सद्भाव के” का काव्य पाठ किया।  साहित्यकार भूपसिंह भारती ने हरयाणवी बोल्ली में  “पर्यावरण बचाणा सै तो, घर घर पेड़ लगाओ, रुदन सुणो ये रो-रो कहरे, ना हमनै काट बगाओ”  रागनी गाकर पेड़ लगाकर पर्यावरण बचाओ का संदेश दिया। रेवाड़ी से गजलकार श्रीभगवान बव्वा ने अपनी गजल “थमेगी सांस दुनिया में व बांका बाल भी होगा, नहीं है तुमको अंदाजा बुरा जो हाल भी होगा” सुनाकर पर्यावरण प्रदूषण पर गहरी चिंता व्यक्त की।अलवर से साहित्यकार रघुवीर सिंह नाहर ने ‘चिड़िया घर के बन्दी’ शीर्षक रचना “क्यों बना बनाकर चिड़िया घर चिड़ियों को बंद किया मानव” गाकर सुनाई।  हैदराबाद से मैत्री महिला संघ की अध्यक्ष कांता बोद्ध ने अपनी रचना “हर प्राणी में हर पौधे में मैं निवास करती, सबको मेरी चाहत है सबको मैं दुलारती, हाँ मैं हवा हूँ” पढ़कर सुनाई। नारनौल से कुण्डलियाकार बाबूलाल तोंदवाल ने अपनी कुण्डलिया “धरती मेरे गाँव की थी औषध भंडार, सांगर पीचू पील के होते थे दीदार” सुनाई। नांगल दरगू से कवि सुनील पागल ने ‘नमक हराम’ शीर्षक अपनी रचना “हम तुम्हारी नमक हराम सन्तानें हैं पृथ्वी हम खाते रहे है सारी उम्र तुम्हारा नमक, जिसका कर्ज चुकाना हमारे कर्तव्यों में शामिल नहीं” सुनाकर तालियां बटोरी। थाणा से कुंडलियाकार रणधीर सिंह ‘धीरू’ ने अपनी कुंडलिया “बढ़ता हर दिन जा रहा, वसुंधरा पर भार, आँचल छिन्न भिन्न हुआ, बिगड़ गया सिंगार” सुनाकर तालियां बटोरी। कवि जयसिंह ‘जय’ ने अपनी कुंडलिया “अपनी करुण गाथा कह धरती करे पुकार, यौवन मेरा छीनकर सुखी नहीं संसार” सुनाकर धरती की व्यथा को अभिव्यक्ति दी। दताल से कवि पप्पू प्रेमी ने अपनी रचना “अगन पवन जल गगन धरण को क्यूँ प्रदूषित इंसान करै, तरहां तरहां के रोग फैलते यो बिन आई म्ह जगत मरै” कविता पाठ कर पर्यावरण बचाओ का संदेश दिया। गणियार बजाड़ से कवि सुंदरलाल उत्सुक ने अपनी रचना “एक एक सब पेड़ लगाए, आओ पर्यावरण बचाये” सुनाकर खूब तालियां बटोरी। कार्यक्रम के अध्यक्ष प्राचार्य राजकुमार जलवा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि देश के भिन्न भिन्न शहरों से जुड़े कवियों ने कवि सम्मेलन के निर्धारित विषय पर्यावरण बचाओ पर सुंदर व सारगर्भित रचनाएँ सुनाकर पर्यावरण संरक्षण का सुंदर सन्देश दिया।