भाड़ावास गेट का मलबा गिरने से हुई मौत पर सीधी सपाट बात : हत्यारिन नप के लिए यह मौत एक टेंडर के अलावा कुछ नहीं है, बात खत्म

रणघोष खास. सुभाष चौधरी

हरियाणा के रेवाड़ी शहर में ऐतिहासिक धरोहर के तौर पर इतरा रहा भाड़ावास गेट 22 अगस्त दोपहर बाद एक रिटायर शिक्षक की मौत का हत्यारा बन गया। मौत किस रूप में कब किस समय आकर अपना काम कर जाए बताने के लिए यह घटना काफी है। इसे अनहोनी कर भूलाया नहीं जा सकता। सीधे तौर पर इस घटना के लिए शहर की जिम्मेदारी संभालने वाले नगर परिषद का सिस्टम पूरी तरह से जिम्मेदार है। यह भी तय है कि इस हादसे के बाद जिला प्रशासन व नप अधिकारियों की आत्मा कुछ समय के लिए जागृत होकर शहर की ऐतिहासिक धरोहर को संभालने के लिए इधर उधर भागती नजर आएगी। मीटिंग होगी, प्रस्ताव पारित होगा। बजट तैयार कर उसे जल्द ही स्वीकृत कराया जाएगा। टेंडर छोड़ कमीशन सेटकर यह मौत भी किसी ना किसी का कमाई का जरिया बन जाएगी। आनन फानन में वह सबकुछ कराया जाएगा जो इस मृतक शिक्षक से उठे सवालों को बिना शोर के दबा दे। ऐसा ही होना है। इससे पहले आवारा पशुओं की चपेट में हुई मौतें इस बात की गवाह है कि इस तरह की घटनाओं के बीच जीने की आदत डाल ले। सोचिए अगर यह गेट किसी की निजी संपत्ति होता तो नप व पुलिस तुरंत इसके मालिक के खिलाफ मामला दर्ज कर उसे अभी तक जेल में डाल देती। अब किसके खिलाफ करें। कायदा यह कहता है कि नप में ऐतिहासिक धरोहर के रख रखाव के लिए गठित टीम, जिम्मेदार अधिकारी या पूरी नप पर ही मामला दर्ज होना चाहिए। आखिर इन धरोहरों के नाम पर आने वाले ग्रांट का सही उपयोग हुआ है या नहीं। इसमें कोई दो राय नहीं कि ग्रांट का एक हिस्सा कमीशनखोरी की परपंरा को निभाते हुए  ठेकेदार, कर्मचारी एवं अधिकारियों की कोठियों को सजने संवारने पर जरूर खर्च होता है। इस घटना ने अब ऐतिहासिक धरोहरों को भी गुनाहगार बना दिया जिसे मजबूर नप के सिस्टम ने किया। कायदे से नप पर ही हत्या का मामला चलना चाहिए। यह घटना नहीं संडाध मारते नाकाम हो चुके सिस्टम की तरफ से एक तरह से की जा रही हत्या है जो किसी ना किसी रूप में हो रही है। कभी आवारा पशुओं की वजह से, कभी बिजली का करंट लगने या फिर रात के समय बेलगाम राक्षस की तरह सड़कों पर दौड़ते भारी वाहनों की वजह से। कुल मिलाकर हत्यारिन नप के लिए यह मौत एक टेंडर के अलावा कुछ नहीं है, बात खत्म।