
रणघोष खास. प्रदीप नारायण
मणिपुर मेरे घर ( रेवाड़ी, हरियाणा) से 3 हजार से ज्यादा किमी दूरी पर है। मेरी भुआ इस छोटे से राज्य की राजधानी इंफाल में रहती है। जब से होश संभाला भुआ को परिवार व रिश्तेदारी के हर घर छोटे बड़े आयोजन व दु:ख की धड़ी में खड़े पाया। हम हैरान होते थे कि 60 साल पार कर चुकी भुआ हजारों किमी का रास्ता तय करके पारिवारिक- सामाजिक जिम्मेदारियों को कैसे निभा लेती है। हमारी देखिए। मजाल भुआ के लाख बुलावे पर भी एक बार मणिपुर देखा हो। एक बेटी के लिए उसका मायका कभी दूर नहीं रहता उसे एक आवाज तो दो।
पिछले दो माह से मणिपुर जल रहा है। चार रोज पहले 2 महिलाओं को निर्वस्त्र कर परेड कराने के वायरल हुए विडियो ने इंसानियत- मानवता को पूरी तरह नोंच खाया। भुआ का एक बार भी फोन नहीं आया। वह जान चुकी थी हजारों किमी दूर बैठे उनके परिजन परेशान नहीं हो जाए। हकीकत यह थी कि हमारी संवेदनाओं पर स्वार्थ ने कब्जा कर पहले से ही दूरियां बना ली थी। लिहाजा मणिपुर में जो कुछ भी होता रहा उसका ज्यादा असर हम पर नहीं हुआ। यह हमारे मृतक होने के साफ लक्षण है। भूकंप से भी भयावह इस घटना का पता चलते ही गुस्सा क्यों नहीं आया। खाना खाते समय निवाला कैसे नीचे चला गया। दुकान पर महिला ग्राहक को देखकर आंखें शर्मसार क्यों नहीं हुईं। शिक्षण संस्थानों में प्रार्थना के समय प्रायश्चित की अरदास क्यों नहीं सुनाई दी। इसका मतलब मै अकेला नहीं मेरे चारों तरफ मुर्दा इंसानियत अपना जमावड़ा बना चुकी है।
हमें माफ करना मैरिकान (बॉक्सिंग), सुशीला चानू (महिला हॉकी खिलाड़ी), मीराबाई चानू (भारोत्तोलन), एल सुशीला देवी (जूडो)। तुमने मणिपुर की जमीं से भारत का ओलंपिक में सीना गर्व से चौड़ा किया ओर बदले में हम मणिपुर की लूटती अस्मिता को बचाने के लिए यह भी नहीं जता पाए कि देश मणिपुर के साथ है। इस घटना के बाद अब खुद को मरा हुआ घोषित कर देने का एलान कर देना चाहिए। दिमागी तौर पर यह मान लेना चाहिए कि निवस्त्र महिलाए नहीं हमारे अंदर का खोखलापन, मर चुकी इंसानियत हुई है। इसलिए खुद को जिंदा इंसान साबित करना है तो जिस स्थिति में है इस घटना को लेकर जोर से चिल्लाइए। चारों तरफ से आने वाली यह गूंज ही बहरे संडाध मारते सिस्टम का सही इलाज है। ऐसा कर पाए तो आइने के सामने खड़ा हो पाएंगे नहीं तो आपका अपना चेहरा आपकी असलियत देखकर शर्मसार होता रहेगा।