अखबार– चैनलों में पत्रकार अब प्रेमिका की तरह नजर आ रहा है
जिस तरह प्रेमी प्रेमिका को शादी झांसा देकर उसके साथ खेल करता रहता है। उसी तरह मीडिया में विज्ञापन भी इन छपास प्रेमियों द्वारा शादी का झांसा देने की तरह होता है जो मालिकों के रहमों करम पर काम करने वाले पत्रकारों को प्रेमिका बनने के लिए मजबूर कर देता है। इसलिए गौर से देखिएगा मीडिया के कार्यक्रमों एवं खबरों में विज्ञापन देने वाले एवं छपास प्रेमी ज्यादा नजर आएंगे ओर उन्हें खुश करते पत्रकार प्रेमिका के अंदाज में दिखेंगे। इसी दरम्यान अगर समाज के असली नायक नजर आ जाए तो समझ लिजिएगा मीडिया में भरोसे की गुंजाइश अभी जिंदा है।
रणघोष खास. सुभाष चौधरी
किसी भी मंच पर मीडिया को आमतौर से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, आमजन की आवाज, सजग प्रहरी जैसे मर्यादित शब्दों से रूटीन में याद किया जाता है। अगर खबर प्रकाशित करवानी हो, पत्रकार से संबंध मजबूत करने हो तो दो कदम आगे बढ़ाते हुए उसे न्याय का रखवाला, निष्पक्ष- बेबाक- बेखौफ- निर्भिक आवाज जैसे शब्दों से खुश कर मकसद को पूरा किया जा सकता है। सही मायनों में मीडिया बाजार में आजकल यहीं ट्रेंड काफी समय से दौड़ रहा है। बस इन शब्दों को अतिशयोक्ति अंलकार की चासनी मे डूबाेकर एक दूसरे का मुंह मीठा करवाते रहिए। जिस तरह का मौजूदा माहौल बना हुआ है। उसमें अब मीडिया का एक ओर नया चेहरा सामने आ रहा है। जो गोदी मीडिया से निकलकर उस प्रेमिका के चरित्र में दिख रहा है जिसमें वह अपने प्रेमी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहकर एक अलग तरह का आदर्श प्रस्तुत कर रही है।
मंथन करिएगा। प्रिंट मीडिया में बड़े व लोकल स्तर पर जितनी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं। उसमें पत्रकार कहां है। किसी प्रेसनोट को प्रकाशित कर मिली तारीफ से खुश होना अगर पत्रकारिता है तो समझ जाइए पत्रकार के दिलों दिमाग पर किसी ओर का कब्जा हो चुका है। अगर यह बात गलत है तो बाजार में विज्ञापनदाता को समाजसेवी, समाजसुधारक, कोरोना योद्धा, पर्यावरणविद बताकर उसे सम्मानित करवा कर इतराने वाले एक बार आइने में अपना चेहरा देखकर खुद पर गर्व करके दिखाए । उसकी वहीं हालत होती है जो ब्यूटी पार्लर से कुछ घंटे के लिए किराए पर मिली सुदंरता की असलियत सामने आने पर होती है। अब सवाल उठता है कि मीडिया में काम करने वाले पत्रकार प्रेमिका के चरित्र में क्यों आ रहे हैं। ऐसी क्या मजबूरी है। जवाब आसान है। अब ना जिम्मेदार- समझदार पाठक एवं दर्शक बचे हैं ओर ना हीं मीडिया मे नजर आने वाले उदाहरण। लोकल लेवल पर बात करें तो एक साल में किसी भी दिन की मीडिया कवरेज निकाल लिजिए। 100-150 के लगभग चेहरे अलग अलग किरदारों में छपास प्रेमी पत्रकारों को प्रेमिका बनाकर खबरों के बहाने चिपकते नजर आएंगे। एक दूसरे को खुश करती इन खबरों के बीच बताइए शायद ही कोई उदाहरण सामने आए जिसमें डॉक्टर्स ने नेचुरल उम्र के साथ जिंदगी के 90 से 00 साल पार किए हो जबकि वे स्वस्थ्य रहने के टिप्स देते है वह इसलिए कि उनके पास डिग्री है। दूसरी तरफ हर दूसरे तीसरे गांव में 90 से 100 साल के बुजुर्गों की अच्छी खासी तादाद मिल जाएगी। यानि जो खुद में उदाहरण है वह मीडिया में गायब है। इसी तरह सरकारी शिक्षक, अधिकारी बेहतर शिक्षा का बखान मीडिया में करते रहते हैं उनके खुद के बच्चे कहां शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इस कथनी- करनी को उजागर करने की जरूरत नजर नहीं आती। मीडिया में सबसे खतरनाक प्रेमी वो नेता है जो समाजसेवी, सामाजिक कार्यकर्ता, समाज सुधारक बनकर मीडिया में थोक के भाव झूठ- पाखंड का व्यापार करते नजर आते हैं। जिस तरह प्रेमी प्रेमिका को शादी झांसा देकर उसके साथ खेल करता रहता है। उसी तरह मीडिया में विज्ञापन भी इन छपास प्रेमियों द्वारा शादी का झांसा देने की तरह होता है जो मालिकों के रहमों करम पर काम करने वाले पत्रकारों को प्रेमिका बनने के लिए मजबूर कर देता है। इसलिए गौर से देखिएगा मीडिया के कार्यक्रमों एवं खबरों में विज्ञापन देने वाले एवं छपास प्रेमी ज्यादा नजर आएंगे ओर उन्हें खुश करते पत्रकार प्रेमिका के अंदाज में दिखेंगे। इसी दरम्यान अगर समाज के असली नायक नजर आ जाए तो समझ लिजिएगा मीडिया में भरोसे की गुंजाइश अभी जिंदा है।