रणघोष की सीधी सपाट बात

  क्या यह संभव है एक अकेला अधिकारी सबकुछ निगल जाए, सोचिए


 –    हर सचिवालय पर प्राइवेट एजेंसी के माध्यम से अनुबंध पर लगे ऐसे कर्मचारियों की जमात मिल जाएगी जिसका वेतनमान हीं 15-20 हजार रुपए प्रति माह है लेकिन वे दफ्तर 15- 20 लाख की गाड़ी में आते हैं। घर से आने जाने पर ही उनका वेतन पेट्रोल- डीजल पर खर्च हो जाता है। वे दफ्तरों में अधिकारियों के साथ मिलकर क्या करते होंगे। इसे आसानी से समझा जा सकता है।


 रणघोष खास. सुभाष चौधरी


करनाल में जिला नगर योजनाकार (डीटीपी) विक्रम सिंह को विजिलेंस ने अवैध कालोनी काटने की छूट देने क बदले 5 लाख रुपए की रिश्वत लेते समय रंगे हाथों पकड़ लिया। यह सिस्टम में भरोसा जिंदा रखने वाली खबर है। इससे पहले भर्ती मामले में दबोचे गए एचसीएस अधिकारी अनिल नागर, भारी वाहनों से वसूली करने वाले कैथल एसडीएम अमरेंद्र सिंह को धर पकड़ा था। डीटीपी विक्रम सिंह के बारे में जो खुलासा हो रहा है वह हर सप्ताह 50 लाख इकठ्‌ठे करने के बाद ही अपने परिवार से मिलने जाता था। इस तरह के मामले सामने आने से एक साथ कई सवाल खड़े हो जाते हैं क्या अकेला अधिकारी पूरे सिस्टम को अपनी उंगली पर नचा सकता है। हरगिज नहीं। सोचिए कुछ समय बाद यहीं अधिकारी कोर्ट से बाइज्जत बरी होकर काम करते हुए नजर आएंगे। हरियाणा में रंगें हाथों पकड़े जा चुके ऐसे सैकड़ों अधिकारी, कर्मचारियों को डयूटी करते हुए देखा जा सकता है। दरअसल जितने भी अधिकारी या कर्मचारी विजिलेंस की चपेट में आते हैं उसकी वजह अवैध वसूली का आपस में ईमानदारी से नहीं बंटना होता है। अधर्मी रावण का वध करने के लिए विभीषण ने धर्म का पालन करते हुए रावण की मौत का राज श्रीराम को बताया था। आज एकदम उलट है। अधिकतर मामलों में खुलासा वहीं करता है जिसे बेईमानी से अर्जित काली कमाई में ईमानदारी से तय किया हिस्सा नहीं मिलता है। क्या ऐसा कोई अधिकारी, कर्मचारी गर्व के साथ यह दावा कर सकता है कि वह पूरी तरह से ईमानदार है जबकि साल में तीन बार इन्हें ईमानदारी से डयूटी करने की शपथ दिलाई जाती है। दरअसल इस पूरे खेल में प्रभावशाली नेता, मंत्री, अलग अलग क्षेत्रों के माफिया की टीम अधिकरियों से मिलकर किसी भी अवैध व अनैतिक कार्यों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए ईमानदारी से आगे बढ़ती है तो सबकुछ बेहतर नजर आता है। इस टीम में किसी एक के गड़बड़ी करते ही सबकुछ पर्दाफाश हो जाता है। सोचिए हरियाणा के हर जिले के सचिवालय पर आपको किसी प्राइवेट एजेंसी के माध्यम से अनुबंध पर लगे ऐसे कर्मचारियों की जमात मिल जाएगी जिसका वेतनमान हीं 15-20 हजार रुपए प्रति माह है लेकिन वे दफ्तर 15- 20 लाख की गाड़ी में आते हैं। घर से आने जाने पर ही उनका वेतन पेट्रोल- डीजल पर खर्च हो जाता है। वे दफ्तरों में अधिकारियों के साथ मिलकर क्या करते होंगे। इसे आसानी से समझा जा सकता है। अभी तक जितने भी भ्रष्टाचार के बड़े मामले विजिलेंस ने पकड़े हैं उसमें इन कर्मचारियों की विशेष भूमिका रही है। वजह शक होने पर अधिकारी खुद को बचाने क लिए इन कर्मचारियों को हटाकर अपने खेल पर पर्दा डाल देते थे। कुछ समय बाद चालाकी से इन कर्मचारियों की पीछे के दरवाजे से एंट्री हो जाती है। वजह इन कर्मचारियों के पास अधिकारियों का काला चिट्‌ठा होता है। लिहाजा खुद को बचाने के लिए वे  इन कर्मचारियों के हिसाब से चलना इनकी मजबूरी है। रेवाड़ी एक कर्मचारी ने तो बकायदा दो से तीन कंपनियां बनाई हुई है जिसके तहत वह ग्राम पंचायतों में होने वाले अलग अलग कार्यों में अपना माल सप्लाई करता है। उसके बदले वह इन पंचायतों को सरकार से विशेष सम्मान व ग्रांट दिलाने का ठेका लेता है। ऐसे एक नहीं अनेक कर्मचारी डयूटी के नाम पर इसी तरह का धंधा करते हुए नजर आएंगे। सभी को सब की खबर रहती है। अगर सच में सिस्टम से भ्रष्टाचार का खात्मा करना है तो ठेकों पर लगे उन कर्मचारियों की लिस्ट बननी चाहिए जिसके वेतन एवं लाइफ स्टाइल में दिन रात का अंतर साफ नजर आता है। इन्हीं से असली खेल का खुलासा हो सकता है। मलाईदार वाले विभाग में जमें ये कच्चे कर्मचारी पर्दे के पीछे बड़े खिलाड़ी होते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो हर बड़े भ्रष्टाचार के खुलासे में इनके नाम नहीं आते।