सीएम साहब रेवाड़ी में 150 अस्पतालों में 500 से ज्यादा डॉक्टर्स की फौज तैनात है, वह जंग खा रही है उसे ताकत बनाइए, पांच वेंटीलेटर देना मजाक है….

रणघोष खास. एक कोरोना पीड़ित की कलम से


सीएम साहब, सोमवार को आप रेवाड़ी आए। मीटिंग ली पांच वेंटीलेटर का पैकेज देकर चले गए। कालाबाजारी करने वालों पर भी आपका गुस्सा वाजिब लगा।  अच्छी बात है। आपके आने से कम ये कम किए जा रहे प्रयासों को कुछ समय के लिए रफ्तार तो मिली। इसी दौरान सिविल अस्पताल की बिल्डिंग से एक कोरोना पॉजीटिव मरीज के आत्महत्या करने की घटना  हो गईँ। समझ में नहीं आ रहा आपकी सरकार और प्रशासन के प्रयासों एवं दावों में कोई कमी नहीं है तो इस तरह की दिल दहला देने वाली मौते क्यों हो रही हैं। सिविल अस्पताल में पहले से ही तीन से चार वेंटीलेटर बिना स्टाफ के जंग खा रहे हैं। इन पांच के ओर आ जाने से क्या हो जाएगा। सबसे बड़ा भद्दा मजाक तो जैन स्कूल में बनाए गए कोविड सेंटर के नाम पर हो रहा है। वहां 50 मरीजों की व्यवस्था आक्सीजन सिलेंडर के साथ की हुई है लेकिन डॉक्टरों की कमी के चलते पिछले चार रोज से अभी तक यह सेंटर शुरू नहीं हो पाया है। एक तरफ हर मिनट- घंटे में स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में कोरोना पीड़ितों की जान जा रही है दूसरी तरफ यहां मीटिंगों में ही इस वायरस को चाय की चुस्कियों के साथ ऐसे निपटने के दावे किए जा रहे हैं मानो कोई करिश्मा होने वाला हो। मजाक बनकर रह गया है हमारा सिस्टम। शहर में 150 से ज्यादा छोटे- बड़े अस्पताल में 500 से ज्यादा डॉक्टर्स की फौज तैनात है। मजाल उनकी ताकत को इंसानियत ओर मानवता में बदल दिया जाए। पैनल के नाम पर कुछ अस्पतालों को ही कोरोना पीड़ित मरीजों का इलाज करने का नियम जमीनी स्तर पर तर्कसंगत नहीं है। सभी को इलाज करने की छूट दीजिए। अपनी खामियों को नहीं छिपाए। अगर कोई अस्पताल मरीजों की संख्या गलत दिखाकर आक्सीजन सिलेंडर मांग रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए टीमें गठित करिए।  सरकार- प्रशासन के पास तो वह असीम ताकतें हैं कि वे चूहे को भी बिल में घुसकर पकड़ सकती है। आप सोचिए एक तरफ मरीजों को अस्पताल में भर्ती होने की जगह नहीं मिल रही है। वे इलाज के अभाव में इधर उधर भटक कर दम तोड़ रहे हैं। बिना पैनल वाले अस्पताल नियमों में बंधे रहने के कारण उन्हें भर्ती नहीं कर रहे हैं। यह कैसी इंसानियत है। यह क्या नियम है।  ऐसी व्यवस्था का फायदा क्या जो मौके पर किसी की जिंदगी ना बचा सके। सही मायनों में यह डॉक्टर्स एवं प्रशासन के बीच एक दूसरे की ताकत बनकर इस वायरस से आमजन को बचाने का इंतहान है। अफसोस हम पूरी तरह से फेल हो गए हैं। इसलिए अपनी कमजोरियत से बचने के लिए लगातार गलतियों पर गलतियां कर रहे हें। हम  सोशल मीडिया पर देख रहे हैं जिले को मिले पांच वेंटीलेटर में दो कोसली को दिए जाने से कुछ लोग अपने नेताओं को इस तरह बधाई दे रहे हो मानो मौतें भी वोटों के हिसाब से बंट चुकी है। क्या जरूरत थी यह कहने कि पांच में 2 कोसली को दिए। क्या कोरोना विधानसभा स्तर पर फैल रहा है। मौजूदा हालातों से निपटने के लिए सभी सरकारी- प्राइवेट डॉक्टर्स को एक सेना की तरह मिलकर लड़ना पड़ेगा। उन्हें मानवता- इंसानियत के नाते दो महीने तक यह भूलना पड़ेगा कि कोरोना उनके लिए बाजार नहीं है। क्या हो जाएगा अगर इस महामारी के नाम पर लूटना बंद कर देंगे। ये हालात में पीड़ित डॉक्टर्स को भगवान मानकर चल रहे हैं ओर मदद करने वाला मसीहा। इसलिए मीटिंगें करिए लेकिन वाही वाही के लिए नहीं। डीसी यशेंद्र सिंह से बहुत उम्मीदें हैं। एक अधिकारी नहीं जमीनी स्तर पर बेहतर इंसान के तोर पर।