हम स्कूल में शिक्षक, घर में माता- पिता खोते जा रहे हैं, रह जाएगा डर- खोखला स्टेटस
रणघोष खास. सुभाष चौधरी
करीब एक माह पहले हरियाणा के रेवाड़ी में गांव माजरा श्योराज सरकारी स्कूल की छात्रा की क्लासरूम में फांसी लगाकर खुद को खत्म करने की घटना का जख्म अभी भरा नहीं था कि अब गांव गोठड़ा पाली में स्थित सैनिक स्कूल के छात्र ने दूसरी मंजिल से कूदकर अपनी जान दे एक गहरा घाव दे गया। इन घटनाओं ने एक बार फिर शिक्षा के मूल्यों व संस्कारों का असली चरित्र सार्वजनिक कर दिया है।
इसका मतलब अब हम यह स्वीकार करना शुरू कर दे कोचिंग सेंटर, प्राइवेट स्कूल के बाद सरकारी स्कूल भी मुर्दाघाट में तब्दील होने शुरू हो गए हैं। इस घटना के लिए सभी जिम्मेदार है जिसमें माता पिता से लेकर स्कूल प्रबंधन और शिक्षा नीति बनाने वाले शामिल है। सही मायनों में यह शिक्षा का घिनौना एवं खोखला चेहरा है। जिसके चलते विद्यार्थी सामाजिक शोहरत के नाम पर जबरदस्ती थोपी गई बेहतर शिक्षा के नाम के जहर को धीरे धीरे पकर खुद को अंदर से मारना शुरू कर देता है। पहले उसे नंबरों के मायाजाल में फंसाया जाता है। उसके बाद उसके मिजाज के खिलाफ उसके शरीर के दिलों दिमाग से खेलकर समाज में अधिकारी, डॉक्टर और बाजार में पैकेज के नाम पर बिकने वाले इंजीनियर की शक्ल में जबरदस्ती तैयार किया जाता है। हालात यह बनते जा रहे हैं कि एक तरफ बच्चे स्कूलों में शिक्षकों के खौफ के साये में जी रहे हैं दूसरी तरफ माता पिता की मनमानी उम्मीदों पर। वह चाहे अनचाहे हर पल खौफ में जीता मरता रहता है। राजस्थान कोटा बच्चों के सुसाइट का प्रमुख स्थल बन चुका है। स्थिति यह बनती जा रही है कि अब शिक्षण संस्थानों में अंदर बाहर उसी तरह का सन्नाटा पसरा नजर आने लगा है जैसा श्मश्यान घाट में महसूस होता है। इस तरह के घटनाओं का संपूर्ण सच पूरी जिम्मेदारी के साथ बिना किसी देरी के साथ सामने आना जरूरी है। पुलिस प्रशासन, शिक्षा विभाग, व सभी को मिलकर घटना की हकीकत को सामने लाने में एक दूसरे का सहयोग करना चाहिए। यह पूरी तरह से स्वीकार कर लेना चाहिए कि शिक्षण संस्थानों में अब सभी शिक्षक गुरु नहीं रहे। गुरु- शिक्षक के बीच में अब शिक्षा का बाजार भी अपनी जड़े जमा चुका है जिसमें विद्यार्थी बेहतर इंसान बनने की जगह एक ऐसे प्रोडेक्ट में तब्दील होते जा रहे है जिसकी पैकेज के नाम पर बाजार में बोली लगती है। कमाल की बात यह है कि इसी पैकेज की वैल्यू के आधार पर माता पिता अपने बच्चों का रिश्ता तय करते नजर आते हैं। विद्यार्थी को प्रोडेक्ट में तब्दील करने के लिए शिक्षक अलग अलग चरित्र और चेहरे में नजर आ रहे है जिनका टारगेट पढ़ाई के नाम पर उन्हें नंबरों की काल कोठरी में घकेलना है जहां संवेदहीन, मूल्य- संस्कारहीन सोच उन्हें जकड़ लेती है। ऐसे परिवेश में लगातार विद्यार्थियों के सुसाइड की इस घटना को लेकर सभी को धैर्य और संवेदनशील होना बहुत जरूरी है नहीं तो हम शिक्षण संस्थानों से गुरु खो देंगे और कक्षाओं में शिष्य और घर में माता पिता.. रह जाएगा सिर्फ डर….।