देश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ तब आया जब Constitution (131st Amendment) Bill 2026 लोकसभा में पास नहीं हो सका।
पांच राज्यों के चुनावों के बीच बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में इस विधेयक पर देर रात तक चर्चा चली, लेकिन जब वोटिंग हुई तो यह जरूरी बहुमत हासिल नहीं कर पाया।
सरकार ने 17 अप्रैल को महिला आरक्षण कानून लागू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी थी, जिससे उम्मीदें और बढ़ गई थीं। लेकिन शाम को हुए मत विभाजन ने पूरा समीकरण बदल दिया।
आंकड़ों में समझिए: कैसे गिर गया विधेयक
लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पास करने के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है।
- कुल मतदान: 528 सांसद
- पक्ष में वोट: 298
- विरोध में वोट: 230
- पास होने के लिए जरूरी: 352 वोट
स्पष्ट है कि समर्थन के बावजूद विधेयक जरूरी आंकड़ा नहीं छू सका और गिर गया।
BJP का हमला: विपक्ष महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ
विधेयक गिरते ही Bharatiya Janata Party ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला।
पार्टी का कहना है कि विपक्ष, खासकर Indian National Congress, महिलाओं को अधिकार देने के खिलाफ खड़ा हो गया है।
वहीं वोटिंग से पहले Narendra Modi ने सोशल मीडिया के जरिए विपक्षी सांसदों से अपील भी की थी कि वे इस विधेयक के पक्ष में मतदान करें।
कांग्रेस का पलटवार: “यह सब सोची-समझी साजिश”
दूसरी ओर Ashok Gehlot ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए।
उन्होंने कहा कि सरकार को पहले से पता था कि विपक्ष के समर्थन के बिना संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो सकता। इसके बावजूद विपक्ष को विश्वास में नहीं लिया गया।
गहलोत के मुताबिक,
- सर्वदलीय बैठक की मांग को नजरअंदाज किया गया
- विपक्षी दलों से अलग-अलग बातचीत कर फूट डालने की कोशिश की गई
- पूरी रणनीति चुनावी फायदे के लिए बनाई गई
विपक्ष की मांग: 2023 वाले कानून को ही लागू करो
विपक्ष का साफ कहना था कि Women Reservation Bill 2023 पहले ही पारित हो चुका है, फिर नए संशोधन की जरूरत क्यों?
उनका तर्क था कि सरकार को पुराने कानून को लागू करना चाहिए, न कि नए बदलाव के जरिए राजनीतिक लाभ लेना चाहिए।
चुनावी रणनीति: हार में भी जीत तलाश रही BJP?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ संसद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध आगामी चुनावों से है।
Bharatiya Janata Party पहले भी महिला वोट बैंक को साधने के लिए बड़े दांव खेलती रही है।
अब दो संभावनाएं साफ दिख रही हैं:
- अगर बिल पास होता → इसे चुनावी उपलब्धि बनाया जाता
- बिल गिरा → विपक्ष को “महिला विरोधी” बताकर राजनीतिक फायदा लिया जाएगा
इस रणनीति की शुरुआत West Bengal और Tamil Nadu से हो चुकी है।
2029 तक गूंजेगा मुद्दा?
विशेषज्ञ मानते हैं कि महिला आरक्षण का मुद्दा अब लंबी राजनीति का हिस्सा बन चुका है।
यह सिर्फ 2026 या मौजूदा विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक इसे लगातार उठाया जाएगा।