हरियाणा पंचायती राज चुनाव में रणघोष की सीधी सपाट बात

 चौधरी बनने के लिए दो महीने में जन्में 75 प्रतिशत उम्मीदवार


 -90 प्रतिशत के पास  लड़ने का विजन हीं नहीं,बस माहौल देखकर मन बना लिया। कोई जाति तो कोई आरक्षण के गणित में अपना जुगाड़ बना रहा है।


रणघोष खास. सुभाष चौधरी

हरियाणा में होने जा रहे पंचायती चुनाव में पंच- सरपंच- ब्लॉक समिति एवं जिला पार्षद बनने के लिए मैदान में उतरे उम्मीदवारों में 75 प्रतिशत का जन्म पिछले तीन माह के दौरान हुआ है। जाहिर है चुनाव परिणाम के बाद हारने पर तुरंत वे वहीं लौट जाएंगे जहां से चले थे। जो जीत गए उसमें कुछ जनता का विश्वास करने के लिए काम करेंगे तो कुछ चुनाव में लाटरी की तरह खर्च की गई राशि को अलग अलग रास्तो से निकालने में लग जाएंगे। बाकि प्रधानी की चौधर के नशे की गिरफ्त में आ जाएंगे। इसके अलावा इस चुनाव की कोई कहानी नहीं है।

इस चुनाव की जमीनी हकीकत यह है कि इसमें 90 प्रतिशत के पास कोई विजन ही नहीं है कि वे क्या और क्यों सोचकर मैदान में उतरे हैं। बस माहौल देखकर मन बना लिया। कोई जाति तो कोई आरक्षण के गणित में अपना जुगाड़ बना रहा है। कुछ उम्मीदवार ऐसे भी है जिसने पिछले दो माह में निजी तौर  पर करोड़ों रुपए की राशि सामाजिक कार्यों, खेल कूद प्रतियोगिता एवं जरूरतमंदों की मदद में बांट दी। ऐसे उम्मीदवार एक टारगेट के तहत चुनाव में उतरे हैं। उन्होंने तय किया हुआ है कि वे इतने करोड़ रुपए की चुनावी लाटरी खेल रहे हैं। ऐसे उम्मीदवार आंधी की तरह आते हैं और हारने के बाद तुफान की तरह लौट जाते हैं। यानि जीतने के लिए वह सबकुछ किया जा रहा हैं जिसमें मूल्य, नैतिकता, कर्मशीलता, समाजसेवा की भावना, समर्पण और विजन दूर तक उनकी सोच में नहीं है।

7 दिन में रणघोष ने 110 उम्मीदवारों से की बातचीत

रणघोष की टीम ने पिछले 7 दिनों में 110 सभी छोटे बड़े पदों के उम्मीदवारों से उनके चुनाव लड़ने की वजह और विकास कराने के विजन पर बातचीत की तो सन्नाटा छा गया। 90 प्रतिशत यह बता नहीं पाए कि वे क्या सोचकर चुनाव में उतरे हैं और किस तरह से अपने गांव वार्ड को आदर्श बनाने के लिए विजन लेकर चल रहे हैं। पूरी तरह जातिगत, व्यक्तिगत, आरक्षण से बने समीकरण के आधार पर बनी मानसिकता से उन्होंने चुनाव लड़ने का मन बनाया है। कुछ ऐसे हैं जो एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। यानि गांव के गली मोहल्लों वं संबंधों के आधार पर बन रही गुटबाजी व धड़ों की वजह से उम्मीदवारों का चयन हो रहा है जिसमें विकास और बेहतर बदलाव की सोच दूर तक नहीं है। इसलिए अधिकांश ऐसे भी हैं जो चुनाव समय में ही अवतरित हुए। इससे पूर्व सामाजिक और अन्य विकास कार्यों में वे कहीं नजर नहीं आए। कुल मिलाकर जिस पंचायती राज चुनाव की परिकल्पना को को आधार बनाकर जिस आदर्श गांव का विजन तैयार किया गया था हकीकत में उसका चेहरा खुबसूरत होने की बजाय बदसूरत ज्यादा नजर आ रहा है इस पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

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