बजट में जन शिक्षा के विस्तार एवं रिक्त पद भरने का अभाव: भारती

हरियााणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने गत दिवस राज्य विधानसभा में वर्ष 2021-22 का बजट प्रस्तुत किया और इस बजट में उन्होंने शिक्षा के लिए कुल 18410 करोड़ बजट जारी करने का आश्वासन दिया है। उल्लेखनीय है कि इसमें मौलिक शिक्षा हेतु 9014 करोड़, माध्यमिक शिक्षा के लिए 5899 करोड़, उच्च शिक्षा/कालेज यूनिवर्सिटी हेतु 2793 करोड़ व तकनीकी शिक्षा सभी का संयुक्त रूप से बजट शामिल है।

हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के राज्य प्रधान सी.एन. भारती ने बजट पर चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त 21वीं सदी की चुनौतियों के मध्यनजर यह बजट काफी कम है। इससे भी गंभीर विचारणीय प्रश्न यह है कि कभी भी बजट सत्र में घोषित शिक्षा बजट भी वास्तव में शिक्षा पर खर्च ही नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष 2020-21 में शिक्षा बजट 18934.31 करोड़ घोषित किया गया था, जबकि वास्तविक खर्च 12623.92 करोड़ ही खर्च किया गया है। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष मौलिक शिक्षा के लिए 9081.38 करोड़ रूपए स्वीकृत किए गए थे परन्तु वास्तविक खर्च केवल मात्र 6712.45 करोड़ ही किया गया। इसी प्रकार माध्यमिक शिक्षा के लिए घोषित 6916.55 करोड़ में से 3992.93 करोड़ खर्च एवं उच्च शिक्षा के लिए घोषित 2936.20 करोड़ में से मात्र 1918.54 करोड़ ही खर्च किए गए।

भारती ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता क्या है, यह भी महत्वपूर्ण होता है और खेद है कि मुख्यमंत्री ने शिक्षा जैसे अहम मुद्दे को प्राथमिकता में ही दर्ज नहीं किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्राथमिकता में न होने के कारण पूरे बजट में जन शिक्षा के विस्तार की कहीं भी कोई योजना नहीं है। वर्तमान सार्वजनिक ढांचे को ही सिकौड़ा जा रहा है। शिक्षा विभाग में 40000 से अधिक पद रिक्त हैं, उन्हें भरने बारे कुछ न कह कर न केवल पढ़ने वाले विद्यार्थियों का नुकसान किया है, बल्कि प्रदेश के लाखों पढ़े-लिखे एच टेट पास बेरोजगारों के सपनों पर भी कुठाराघात किया है।

उन्होंने कहा कि प्री प्राइमरी कक्षाओं को प्राथमिक विद्यालयों का हिस्सा न बनाना, शिक्षा के ढांचे को ही तहस-नहस करना होगा। बजट में भाषा एवं गणित की शिक्षा के लिए एन.जी.ओ. के साथ समझौता करना व तरह-तरह के नए-नए ऐप व अन्य प्रशिक्षण आदि प्राइवेट सेक्टर में देकर शिक्षा बजट को प्राइवेट क्षेत्र में देने का प्रावधान किया गया है, जो किसी भी सूरत में प्रदेश की जनता को मंजूर नहीं।

भारती ने कहा कि संस्कृति माडल स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम करके राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 एवं इन सरकारी विद्यालयों में भी बच्चांे से फीस लेकर शिक्षा अधिकार कानून-2009 को धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

उन्होंने कहा कि कोरोना काल में असंवैधानिक तरीके से रोके गए डी.ए. को जुलाई 2021 से देने बारे भी बजट में कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया है, जबकि कर्मचारी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि जुलाई 2021 से 17 प्रतिशत के स्थान पर कम से कम 31 -32 प्रतिशत ही तो मिलेगा ही। बजट में एक बात पुनः दोहराई गई है कि मेडिकल कैशलेस सुविधा धरातल पर केवल बयानबाजी ही है तथा कागजों तक ही सिमटी हुई है। अध्यापकों व कर्मचारियों को वास्तविक लाभ कब और कैसे मिलेगा, कुछ स्पष्ट नहीं किया गया है।

भारती ने कहा कि उनके संगठन को इस बात का भी खेद है कि कोविड-19 जैसी महामारी में अध्यापकों को फ्रंट लाइन वर्कर की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया, जबकि महामारी के दौरान अध्यापकों से दर्जनभर से अधिक इमरजेंसी सेवाएं ली गई। प्रदेश के 70 प्रतिशत से अधिक सरकारी अध्यापक बिना किसी स्वास्थ्य उपकरण के अपनी जान जोखिम में डाल कर शुरुआती दौर के लाॅकडाऊन में भी घर-घर जा रहे थे, वे अस्पताल, शेल्टर होम, जिला व राज्य बॉर्डर पर, अनाज मंडियों, अनेक प्रकार के सर्वे, मिड-डे-मील राशन बांटने आदि का कार्य कर रहे थे परन्तु सरकार व विभाग ने उनके कार्य को पहचान तक नहीं दी।

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