पर्यावरण बचाने के लिए कानून का डंडा नहीं खुद की चेतना काम करेगी..

यहां स्पष्ट हो जाना चाहिए की किसी व्यवस्था को डंडे के जोर से लागू नहीं किया जा सकता। समाज में स्वयं चेतना जगे और लोग देश में कोरोना और प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए पटाखों को स्वेच्छा से छोड़ें। हैरत होती है कि सोशल मीडिया पर पटाखों पर प्रतिबंध के खिलाफ एक अभियान भी चलाया जा रहा है।  गंभीर बात यह है कि कुछेक लोग इसे धार्मिक रंग देने की कोशिश करते हैं, जो चिंताजनक है। दीपावली पर कुछ और अच्छे अभियान भी चले हैं. मसलन, चीनी झालर की जगह मिट्टी के दिये जलाने का अभियान चला है। हम सबको इसका समर्थन करना चाहिए। इसका फायदा हमारे कुम्हार भाइयों को मिल सके और हम पारंपरिक तरीके से दीपावली मना सके।  देश की राजधानी प्रदूषण के कारण बदनाम है और वहां सांस लेना भी मुहाल है। वहां अभी प्रदूषण इतना ज्यादा बढ़ गया है कि आसमान में धुएं की परत साफ देखी जा सकती है। एक तर्क दिया जा रहा है कि पटाखे नहीं खरीदने से इसके कारोबारियों को भारी नुकसान होगा, लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि लोग इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकायेंगे।  बिहार और गुजरात में शराबबंदी लागू है.

इन राज्यों को प्रतिबंध के कारण करोड़ों के राजस्व का नुकसान होता है। इसके बावजूद यह लोगों के स्वास्थ्य और समाज की खुशहाली के मुकाबले कुछ भी नहीं है। पटाखों पर प्रतिबंध से यदि लोगों के स्वास्थ्य और जान की रक्षा होती है, तो इसके आगे कितनी भी बड़ी रकम हो, वह कुछ भी नहीं है। विशेषज्ञ कहते हैं कि यदि प्रदूषण न हो तो 20 हजार फीट ऊंची कोई भी शृंखला लगभग 300 किलोमीटर दूरी से नजर आ सकती है. कहने का आशय यह है कि अगर शासन व्यवस्था और लोग ठान लें, तो परिस्थितियों में सुधार लाया जा सकता है।  इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि किसी के कहने-सुनने से राय न बनाएं, खुद ही परिस्थिति का आकलन करें और निर्णय लें। आइए, हम सब मिल कर दीपावली पर खुशी के दिये जलाए, पर्यावरण के नाम पर एक पौधा लगाए। और न केवल दीपावली पर, बल्कि पूरे साल साफ-सफाई का ख्याल रखें. साथ ही अपनी नदियों-तालाबों को प्रदूषण मुक्त रखने का संकल्प लें.

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