शिक्षा विभाग ने जारी की गाइड लाइन

कोचिंग सेंटर- एकेडमी के नाम पर खुली दुकानों से अपने बच्चों की जिंदगी बचाए


–    शहर से सटे गांवों में खुली एकादमी व सेंटरों में चल रहा खेल। क्या यह संभव है कि एक छात्र एक ही समय में दो स्थानों पर पढ़ाई कर सकता है

–    झूठ की बुनियाद व अंकों के खेल में तबाह हो रही बच्चों की जिंदगी, रेवाड़ी शहर में तीन दिन पहले सुसाइड करने वाला छात्र इसी मानसिकता का शिकार बना।

–    सबसे ज्यादा अभिभावक जिम्मेदार जो अपने बच्चों के बचपन को खत्म कर उसे प्रोडेक्ट बनाने में लगे हैं ताकि पैकेज के तौर पर उसे बाजार में बेचकर अपना बुढ़ापा सुरक्षित कर ले

–आधे से ज्यादा एकेडमी संचालक वो है  जिनके खुद के बच्चे ही अपने कैरियर में सफल नहीं हो पाए हैं। वे खुद अपने जीवन में असफल रहे हैं लेकिन बाजार में शिक्षा को कैसे बेचा जा सकता है यह उन्हें आता है।


रणघोष खास. एक विद्यार्थी की कलम से


तीन दिन पहले रेलवे पार एक छात्र ने सुसाइड कर लिया। वजह वह कुछ ओर बनना चाहता था माता-पिता की जिद कुछ ओर थी। स्कूल छुट्‌टी के बाद उसे सेक्टर चार में दुकानों की तरह खुले कोचिंग सेंटर में टयूशन के लिए जबरदस्ती भेजा जाता था ताकि वह परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा नंबर हासिल कर सके। वह अंदर से टूटता चला गया। 11 वीं का रजल्ट आया तो वह दो विषयों में फेल मिला। माता-पिता के डर ने इस मासूम को हमेशा के लिए फंदे पर लटकने के लिए मजबूर कर दिया। देशभर में हर घंटे इस तरह की घटनाएं हो रही हैं। इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार माता- पिता और उसके बाद जगह जगह शिक्षा की दुकानों के नाम पर खुले टयूशन, कोचिंग सेंटर और बेहतर भविष्य बनाने का ठेका लेने वाली एकेडमियां जिम्मेदार है। शहर के दिल्ली रोड, महेंद्रगढ़ रोड, ढालियावास, सेक्टर 18, माडल टाउन, सभी सेक्टरों में पढ़ाई के नाम पर शिक्षा की दुकानें चल रही हैं। शिक्षा विभाग ने इन दुकानों से बचने के लिए एक बार फिर गाइड लाइन जारी की है। उनके मुताबिक जिस तरह अवैध प्लाटिंग  का खेल चलता है उसी तरह बिना किसी अनुमति, मान्यता के कोचिंग सेँटर व एकेडमी खुले हुए हैं। कुछ ऐसी है जो तीन से चार मंजिलां बनी हुई है। यहां आस पास जिलों एवं बाहरी राज्यों से बच्चे रहते हैं। कागजों में ये सैकड़ों किमी दूर स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं हकीकत में पूरे समय यही रहते हैं। यानि झूठ की बुनियाद पर बच्चों का भविष्य बनाने का खेल किया जा रहा है। शिक्षा अधिकारियों के मुताबिक आगे चलकर इन बच्चों का सर्वांगिण विकास रूक जाता है। वे स्कूल की संस्कृति व संस्कार से पूरी तरह से कट जाते हैं। महज ज्यादा नंबरों की मानसिकता उनके दिलों दिमाग में बैठा दी जाती है जिस कारण एकाकीपन व सामाजिक दूरियां उन्हें अच्छी लगने लगती है। ऐसे बच्चे बहुत ही जल्दी डिप्रेशन का शिकार होते हैं ओर असफल होने पर गलत कदम उठाने में देर नहीं लगाते हैं।

कोचिंग सेंटर से दीवार फांद 30 किमी पैदल घर पहुंचा विद्यार्थी

आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जब माता-पिता जबरदस्ती बच्चों को इन सेंटरों में बने छात्रावासों में छोड़कर चले जाते हैं। कुछ समय पहले एक एकेडमी से दो छात्र दीवार फांद कर 30 किमी पैदल चलकर रातों रात पैदल चलकर अपने घर पहुंच गए। संयोगवश रास्ते में कोई अप्रिय घटना नहीं हुई इसलिए शोर नहीं मचा।

दिन रात  पढ़ना, खाना – पीना  सोना, यही है इन बच्चों की जिंदगी

इन एकेडमियों एवं सेंटरों में रह रहे बच्चों की जिदंगी बाहरी दुनिया से पूरी तरह से कट जाती है।  दिन रात पढ़ना, खाना एवं सोना ही इनकी दिनभर की दिनचर्या है। सोचिए जितने भी सफल इंसान हुए हैं क्या वे इसी मानसिकता एवं माहौल से निकले हैं। हरगिज नहीं। एक भी ऐसा सफल उदाहरण नहीं जिसने अपने दिलों दिमाग  एवं अपने व्यक्तित्व को अंकों की तराजु में तोला हो। पढ़ने एवं आगे बढ़ने के लिए सर्वागिण विकास जरूरी है जो स्कूल में जाकर समाज में रहने, मिलने, समझने एवं अलग अलग गतिविधियों में शामिल होकर आता है। ये एकेडमी महज ज्यादा नंबरों के खेल में उन बच्चों की जिंदगी तहस नहस कर रही है  जिसकी मनो स्थिति इतनी परिपक्व नहीं बन पाई जिसमें वह तय कर सके कि  उसे वह बनना है। उसकी सोच पर तो उनके माता–पिता की जिद  एवं एकेडमी संचालकों का बाजार छिपा होता है। सोचिए आधे से ज्यादा एकेडमी संचालक वो है  जिनके खुद के बच्चे ही अपने कैरियर में सफल नहीं हो पाए हैं। वे खुद अपने जीवन में असफल रहे हैं लेकिन बाजार में शिक्षा को कैसे बेचा जा सकता है यह उन्हें आता है।

 विज्ञापनों में झूठ का पुलिंदा,  जितनी सीटें नहीं उससे ज्यादा सेलेक्शन

पिछले कुछ दिनों से सैनिक स्कूल की परीक्षा में चयन को लेकर कोचिंग सेंटर, एकेडमी एवं कुछ स्कूलों की तरफ से प्रकाशित विज्ञापनों में सैकड़ों बच्चों के चयन होने का दावा किया जा रहा है। गौर करिए राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली इस परीक्षा में देशभर के स्कूलों के विद्यार्थी भाग लेते हैं। अकेले रेवाड़ी- महेंद्रगढ़ के स्कूल, एकेडमी एवं कोचिंग सेंटरों ने सफल बच्चों की जो संख्या दिखाई है उतनी तो सैनिक स्कूल में सीटें तक नहीं है। बाकि राज्यों एवं जिलों के स्कूल कितना दावा करते होंगे यह गौर करने वाली बात है। यानि फर्जीवाड़ा ज्यादा हकीकत कम।

इन दुकानों से अपने बच्चों को बचाए: डीईओ

जिला शिक्षा अधिकारी नसीब सिंह ने कहा कि यह शिक्षा के नाम दुकानों के अलावा कुछ नहीं है। बच्चों का सर्वांगिण विकास स्कूल में आकर ही हो सकता है। यह सरासर गलत है कि बच्चे का एडमिशन किसी स्कूल में किया हुआ है ओर वह पढ़ाई किसी एकेडमी के हॉस्टल में कर रहा है। यह गैर कानूनी है। शिकायत मिलते ही तुरंत कार्रवाई की जाएगी। हमारी अभिभावकों से अपील है कि वे नंबरों के लालच में अपने बच्चों की जिदंगी से खिलवाड़ मत होने दे। उसे स्कूल में ही भेजे।  वहीं बनने दे जो वह चाहता है। हमारी नजर में जो कोचिंग सेंटर व एकेडमी ऐसा कर रही है वह गैर कानूनी है।

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