जैन वैश्य समाज का घटक है तो इसे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक का दर्जा क्यों मिला

 अगर तथ्य व दस्तावेज इसे वैश्य का अंग मान रहे हैं तो कायदे से वैश्य समाज को भी राष्ट्रीय अल्पसंख्यक में ही शामिल होना चाहिए।


रणघोष अपडेट. देशभर से

देशभर में वैश्य समाज के सभी घटकों को एक मंच पर लाने के लिए गठित अखिल भारतीय वैश्य महासम्मेलन के स्वरूप, सिद्धांत, कार्य करने की पद्धति, विचारधारा और मूल उद्देश्य के असल सच को लेकर बहस शुरू हो गई है। सबसे बड़ा सवाल जैन समाज को लेकर है। अगर यह समाज वैश्य उत्पति के मूल अंश से ही निकला है तो इसे देश में अलग से अल्पसंख्यक का दर्जा किस आधार पर मिला है। अगर तथ्य व दस्तावेज इसे वैश्य का अंग मान रहे हैं तो कायदे से वैश्य समाज को भी अल्पसंख्यक में ही शामिल होना चाहिए।

10 साल पहले बिहार के मुंगेर क्षेत्र की तरफ से जारी सरकारी दस्तावेज से काफी कुछ समझा जा सकता है। मुंगेर में हजारों जैन समुदायों के बीच जाति वर्ग को लेकर असमंजस की स्थिति उस समय उत्पन्न हो गई है, जब राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने इस जाति को सामान्य जाति का सदस्य होने की जानकारी दे दी है। मनोज कुमार जैन को सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी मिली जब श्री जैन ने अपने पुत्र प्रांशु जैन का जाति प्रमाण पत्र बनाने के लिए प्रखंड कार्यालय गया तो सदर प्रखंड के कर्मियों ने वैश्य जाति का प्रमाण पत्र बनाने से इंकार कर दिया। इसके बाद श्री जैन ने आरटीआई  के तहत सरकार से यह जानकारी मांगी कि जैन धर्म के लोग किस जाति में शामिल हैं। जवाब में सरकार के अवर सचिव सह लोक सूचना पदाधिकारी सिद्धनाथ राम ने बताया कि जैन समुदाय किसी जाति विशेष के रूप में अधिसूचित नहीं है। इसके कारण आरक्षित वर्गो से भिन्न श्रेणी के व्यक्ति सामान्य जाति का सदस्य होता है। इसके पूर्व कई जैन समुदाय का जाति प्रमाण पत्र वैश्य के रुप में बना हुआ था।

 जनवरी 2014 में जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा मिला

जनवरी 2014 में  प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। दिल्ली, मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित लगभग दर्जन भर से अधिक राज्य पहले ही राज्य स्तर पर जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा दे चुके थे। ऐसा हो जाने से  जैन समुदाय के 50 लाख से ज्यादा लोगों को भी देश के अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की तरह सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों का फायदा मिलने लगेगा। जैन समुदाय अपने निजी शिक्षण संस्थानों को स्वशासी बना सकेगा। वर्तमान में मुस्लिम, सिख, पारसी, ईसाई व बौद्ध समुदाय के लोगों को यह दर्जा हासिल है।जैन समुदाय के लिए अल्पसंख्यक दर्जे की मांग काफी पुरानी थी। हमारे संविधान के अनुच्छेद 29 में अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण और अनुच्छेद 30 में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की स्थापना एवं संचालन करने आदि अधिकारों का साफ-साफ उल्लेख है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार (यूएनएचआर) से जुड़े नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार अंतरराष्ट्रीय नियम 1966 के तहत ऐसे समूहों को अल्पसंख्यक अधिकार प्रदान किए जा सकते हैं, जो जातीय, धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यक हों और जिनकी अपनी अलग पहचान एवं संस्कृति हो। यानी भारतीय संविधान और संयुक्त राष्ट्र द्वारा दी गई अल्पसंख्यकों की परिभाषा के दायरे में जैन समुदाय भी आता है।जैनागम और इतिहास का तटस्थ अध्ययन करने से साफ मालूम होता है कि जैन धर्म विश्व का प्राचीनतम धर्म है। यह एक स्वतंत्र धर्म है। यह न वैदिक धर्म की शाखा है और न बौद्ध धर्म की।जैन धर्म के अपने मौलिक सिद्धांत, परंपरा, इतिहास और ग्रंथ हैं, जो इसे अन्य धर्मों से अलग करते हैं। जाति, धर्म के आधार पर मंडल कमिशन ने भी जैन समुदाय को अहिंदू धार्मिक ग्रुप में मुस्लिम, सिख, बौद्ध व ईसाइयों के साथ रखा है। ऐसे में जैन समाज राजनीतिक- सामाजिक और कानून तर्क संगत से वैश्य समाज का घटक कैसे हो सकता है। यह विचारनीय पहलु है।

 हिंदू- जैन धर्म की अपनी- अपनी परंपराए

सरकार के अवर सचिव सह लोक सूचना पदाधिकारी सिद्धनाथ राम स्पष्ट कर चुके हैं  कि  जैन समुदाय किसी जाति विशेष के रूप में अधिसूचित नहीं है। इसके कारण आरक्षित वर्गो से भिन्न श्रेणी के व्यक्ति सामान्य जाति का सदस्य होता है। जैन धर्म आत्मा और पुर्नजन्म में तो विश्वास करता हैं लेकिन भगवान के अवतार की अवधारणा नही हैं जबकि हिन्दू धर्म चूंकि वैदिक परम्परा से हैं भगवान के अवतार की अवधारणा हैं जैसे विष्णु के 24 अवतार हुए वही जैन धर्म मे 24 तीर्थंकर हैं लेकिन वो अवतार नही हैं।मुख्य वेदी पर विराजमान भगवान मंदिर के मूलनायक कहलाते है। जैन समाज में ऐसे कई मंदिर हैं जहां मूर्ति के स्थान पर जिनवाणी रखी होती हैं। ऐसे मंदिरों को चैत्यालयों कहते हैं इनमें दिगंबर जैन तारण पंथी पूजा करने जाते हैं। भारत एक जातिप्रधान देश है, जहां हजारों जातीय समूह है, इनमें भारतीय जनता बंटी है,यह जातियां वर्णों से संचालित होती है,मुख्यतः वर्ण 4 है। ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र। जैन-धर्म जातिप्रथा का विरोधी धर्म रहा है,यहां कर्म के अनुसार जीव का भविष्य तय होता है।प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव से ही वर्ण व्यवस्था प्रारंभ हुई है,जैनाचार्यों ने वर्ण को कर्मणा माना है। हम प्राय: इस बात को अनदेखा कर देते हैं कि जैन जाति नहीं, धर्म है। शिक्षाविद निर्मला जैन का कहना है कि  जाति की बात करें, तो जैन धर्म के अधिकांश अनुयायी जाति से बनिए होते हैं। इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने की है कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से बड़ी संख्या क्षत्रिय राजपरिवारों के युवाओं की थी। जैन धर्म के सिद्धांतों में सर्वाधिक महत्व अहिंसा का माना जाता है। इस धर्म की आस्था का मूल सूत्र ही है : अहिंसा परमो धम:। यह स्वीकार करने के बाद स्वभावत: अपने से इतर प्राणियों के प्रति दया भाव या परोपकार वृत्ति को जीवन में चरितार्थ करने की अपेक्षा जैन धर्म में आस्था रखने वालों से की जाती है।

सबसे बड़ा सवाल वैश्य समाज की अपनी असली पहचान क्या है

अखिल भारतीय वैश्य महासम्मेलन का आधार पूरे देश में फैला हुआ है। जिसके आधार पर वैश्य समाज सामाजिक और राजनीतिक प्लेटफार्म पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि 352 से ज्यादा वर्ग के लोगों की दिनचर्या एवं कार्यप्रणाली को वैश्य मानकर उसका सामाजिक और  राजनीतिकरण किया जा चुका है और इससे संबंध रखने वाले 95 प्रतिशत को इसका अहसास तक नहीं है। उन्हें अपनी असली पहचान तक नहीं मालूम है। अगर ऐसा होता तो सभी घटकों को मिलाकर वैश्य समाज का अपना कोई प्रमाणिक चिन्ह्, एजेंडा या एक सोच मंच पर नजर आती। असल सच तो यह है कि जब किसी भी प्रदेश या देश में छोटे बड़े चुनाव की आहट होती है वैश्य के नाम पर अलग अलग संगठनों के नाम पर सक्रियता चरम पर पहुंच जाती है और मकसद पूरा होने के तुरंत बाद खत्म हो जाती है। ऐसे में वैश्य समाज से जुड़े घटकों की जड़ों तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि उसके इतिहास, उत्पति एवं स्वरूप को बड़ी जिम्मेदारी के साथ समझा जाए।

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