नहीं अभी नहीं। अभी तो तुम्हें मुझे फिर से पाना होगा। मैं नहा धोकर कपड़े लत्ते बदल कर, तुम्हारी बाट देखूँगी

होई जबै द्वै तनहुँ इक


बावरी चली पिया के देस ( अध्याय 25)


Babuरणघोष खास. बाबू गौतम 

‘मुझे याद है वह सुबह। याद है कहना, सही नहीं है, जब समय बीता ही नहीं है। मैं वहीं हूँ। उससे बाहर निकल कर यहाँ आता हूँ।’

बावरी ने अपनी क्षीण आवाज़ में उलाहना देते हुए कहा था, ” इब थे इंया उँया कोनी भागो, बस म्हारै सागै बैठ जावो!” उसकी आँखों की मुस्कुराहट से मुझे लग रहा था, वह कहीं दूर से मुझे देख रही है। मैं उस बच्चे की तरह नज़रें चुरा रहा था, जिसे उसकी मरणासन्न माँ कहे, ” देख मैं जा रही हूँ, तू ठीक से खाना खाया करना।’

मैं बावरी के पास जाकर बैठ गया।

“थे के समझो, बीमार सूं! इलाज कराना चाहो सो थे ?….. भंवर जी, इलाज जीण खातिर होवे, जाण खातिर नाय। म्हें जावां इब।”  उसकी आँखों में हँसी के साथ एक आँसू छलक आया था। मैंने नज़र नीची कर ली। उसने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख कर धीरे से दबाया। मुझे लगा वह कह रही है। ” कुछ और भी है, जो कुछ हो रहा है…इससे अलग, समझो।”

“ल्यो आज थानै किमी गायके सुनाऊं।” वह मुस्कुराई।

मैं उसे रोकना चाह रहा था। पर वह मन बना चुकी थी।

उसने अपनी कंपकपाती आवाज़ को उठाया।’ यह कह कर, वह गुनगुनाने लगा:

‘नयना अंतर आ पिया…..पलक ढांप तोहे लूँ!………ना देखूं मैं और को……… ना तोहे देखन दूँ …!’

बावरी की आवाज़ में वही मधुरता थी, पर इतनी धीमी थी जैसे कहीं दूर जंगल से आ रही हो। कह रही हो- ‘आ मुझे ढूँढ!’

मैंने नज़रों ही नज़रों में उससे कहा, ” मैंने ढूँढ़ लिया है तुम्हें, बस अब मौन होकर मुझे देखती रहो।”

उसने मुँह फेर लिया, जैसे कह रही थी। “नहीं अभी नहीं। अभी तो तुम्हें मुझे फिर से पाना होगा। मैं नहा धोकर कपड़े लत्ते बदल कर, तुम्हारी बाट देखूँगी।”

इतना कह कर, अचानक उसने मेरी तरफ चेहरा घुमा कर अपनी आवाज़ को पूरे ज़ोर से उठाया।’ इसने भी अबकी बार आकाश की तरफ़ मुँह करके, आँखें मींच कर गाया।

” काग़ा सब तन खाइयो….. मेरो चुन चुन ख़ाइयो माँस…!” उसे अपना स्वर फाल्सेटो तक ले जाना पड़ा।

फिर उतरा…

‘दो नयना मत ख़ाइयो….. मोहे पिया मिलन ………..!’ और पूरा नही कर पाया, रुक गया।

बस यहीं रुक गयी थी, बावरी की आवाज़। बावरी की आँखों से धार बह निकली।  उसके होंठ हिल रहे थे। बावरी की आवाज़ चली गयी थी।

यह ख़ुसरो नहीं है, यह तो तुम्हें पता ही होगा? यह बाबा फरीद ने लिखा था, जो ख़ुसरो के गुरु निज़ामुदीन औलिया के भी गुरु थे।

मैंने जवाब नहीं दिया। मैं उसे बावरी की कहानी से बाहर निकलने का मौका नहीं देना चाहता था। मेरे लिए भी समय निकल रहा था।

उसने मद्धिम सी आवाज़ में आगे कहा- ” मैं देख रहा था, उसे जाते हुए। उसकी आँखें कह रही थी,” मैं जानती हूँ तुम्हारी विवशता, तुम्हें मेरा आधा जीवन जीना है अभी।”

क्रमश जारी….

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