बिसरख: ऐसा गांव जहां रावण की पूजा होती है

 रणघोष खास. पीरजादा मुज्जमिल

नई दिल्ली से लगभग 33 किमी पूर्व में उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्धनगर जिले में एक गांव है- बिसरख। 2011 की जनगणना के अनुसार इस गांव की आबादी करीब 5500 है। बिसरख किसी मायने में अन्य गांवों से अलग नहीं है बजाय इसके कि यहां राम नहीं बल्कि रावण पूजा जाता है।

लंका का दानव राजा (रावण), हिंदू देवता और प्राचीन संस्कृत महाकाव्य रामायण के नायक राम का कट्टर प्रतिद्वंद्वी हैं। कहानियों में, रावण ने राम की पत्नी, देवी सीता का अपहरण कर लेता है, जिससे बाद, श्री राम बंदरों की एक सेना को इकट्ठा करते और उसके राज्य, लंका पर हमला कर देते हैं। रावण पर राम की जीत भारत के अधिकांश हिस्सों में नवरात्रि के त्योहार के दौरान मनाई जाती है। इस वर्ष 10 दिवसीय पर्व 26 सितंबर से 5 अक्टूबर तक मनाया जाएगा।

बिसरख में, हालांकि, नौ त्योहार दिन उत्सव की अवधि नहीं हैं। जहां 10वें दिन पूरे देश में रावण के पुतले जलाए जाते हैं, वहीं दशहरा में बिसरख वासी ऐसा करने से मना कर देते हैं। गांव निवासी 45 वर्षीय पंकज का कहना है, “हम अपने पूर्वज का पुतला कैसे जला सकते हैं? यह अशोभनीय होगा।” इसके निवासियों का यह भी मानना है कि इस गांव का नाम रावण के पिता और एक प्रसिद्ध ऋषि विश्रवास के नाम पर पड़ा है।

स्थानीय हीरो

ग्रामीणों में रावण के प्रति जो श्रद्धा है, वह गांव में प्रवेश करते ही स्पष्ट हो जाती है। उनका नाम दर्जनों दुकानों में देखा जा सकता है। ऐसा ही एक दुकान है रावण डीजे, जहां से आप त्योहारों और समारोहों के लिए संगीत उपकरण किराए पर ले सकते हैं।  खेतों में काम करने वाले या दुकानों के सामने गपशप करने वाले पुरुष दस सिर वाले दानव राजा के चित्रण के साथ शर्ट पहनते हैं। यहां कार और ट्रक की खिड़की के शीशे और बम्पर स्टिकर पर भी रावण का तस्वीर दिख जाना आम है।

गांव के मध्य में हिंदू भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर है। इसे बिसरख रावण मंदिर कहा जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि रावण और उसके पूर्वजों ने यहां पूजा की थी। एक शिवलिंग के अलावा, अन्य देवी-देवताओं और संतों की मूर्तियाँ हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी विनय भारद्वाज कहते हैं, “हम यहां जिस शिवलिंग की पूजा करते हैं, उसकी स्थापना रावण के दादा पुलस्त्य ने की थी। पुलस्त्य के पुत्र विश्वासवा और उनके पोते रावण और कुंभकरण ने यहां शिव की पूजा की है।” वो कहते हैं, “रावण ने वर्षों की पूजा के बाद चमत्कारी शक्तियां प्राप्त कीं जिससे उसे अपने भाई कुबेर को हटाने और लंका के सिंहासन पर चढ़ने में मदद मिली।”

शहरी अध्ययन विद्वान वंदना वासुदेवन ने अपनी पुस्तक अर्बन विलेजर: लाइफ इन एन इंडियन सैटेलाइट टाउन (2013) में दावा किया है कि अष्टकोणीय शिवलिंग को पास के एक जंगल से निकाला गया था और मंदिर में रखा गया था। गांव में अन्य देवताओं को समर्पित कई मंदिर हैं, जिनमें से कई सौ साल से अधिक पुराने हैं। 2014 में, मीडिया ने बताया कि ग्रामीण रावण को समर्पित एक मंदिर बनाने की योजना बना रहे थे और इसे पूरा करने के लिए ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से 2 करोड़ रुपये की मांग कर रहे थे। हालांकि, विश्व हिंदू परिषद की युवा शाखा बजरंग दल ने इस कदम का विरोध किया। दो साल बाद, जब योग गुरु, अशोकानंद ने कथित तौर पर गांव में अपने आश्रम में रावण की एक मूर्ति स्थापित की, तो उसे रातोंरात तोड़ दिया गया।

कई ग्रामीणों ने बजरंग दल पर इस कृत्य का आरोप लगाया, लेकिन कोई भी इस बात का जवाब नहीं दे सका कि इकाई द्वारा रावण की पूजा का विरोध क्यों किया जाएगा। हालांकि बजरंग दल ने इसपर कोई टिप्पणी नहीं की।

अजीब घटनाएं

अधिकांश भारतीय कस्बों और गांवों के विपरीत, बिसरख दशहरा नहीं मनाता है। लेकिन यह न केवल ग्रामीणों के पौराणिक पूर्वजों के प्रति श्रद्धा के कारण है बल्कि वे यह भी मानते हैं कि त्योहार मनाने से उन पर रावण का प्रकोप होगा।

अतीत में नवरात्रि के आसपास अजीबोगरीब घटनाओं के बारे में गाँव में कई कहानियाँ हैं – हालाँकि इनका कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। बिसरख निवासी 50 वर्षीय धनसिंह भट्टी कहते हैं, ”एक बार दशहरे पर एक परिवार ने रावण का पुतला जलाया था और अगले दिन परिवार के दो सदस्यों की मृत्यु हो गई।”

जबकि अन्य ग्रामीणों ने भी यह कहानी सुनी है, हालांकि कोई भी पुष्टि नहीं कर सका कि किस परिवार को दुर्भाग्य का सामना करना पड़ा था। भट्टी का कहना है कि हमने इसे अपने बड़ों से सुना है। पिछले 30 वर्षों में गांव ने राम लीला-नवरात्रि के दौरान आयोजित रामायण के एपिसोड का एक पारंपरिक नाट्य चित्रण भी नहीं किया है।

60 वर्षीय ग्रामीण भीर सिंह, भट्टी की पुष्टि करते हैं। वह दावा करते हैं कि गांव ने आखिरी बार राम लीला करीब 5 दशक पहले देखी थी। सिंह कहते हैं, “जिन ग्रामीणों ने किसी राम लीला की मेजबानी की, उनका आयोजन किया या उसमें हिस्सा लिया, उनके परिवारों में इसके तुरंत बाद मृत्यु हो गई।” वह कहते हैं, “हालांकि हम राम का सम्मान करते हैं और उनकी पूजा करते हैं और वह हमारे भगवान हैं। लेकिन हम यह मानते हैं कि राम लीला गांव के लिए अशुभ है।” उन्होंने कहा कि मेरे पिता ने मुझे उन परिवारों के बारे में बताया बताया था जिन्होंने प्रियजनों, व्यवसाय, खुशी और शांति समेत सबकुछ खो दिया।

राम और रावण

गांव के रावण मंदिर में प्रधान पुजारी भारद्वाज पिछले 16 सालों से अनुष्ठानों की देखरेख कर रहे हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण यहां सभी हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं।

भारद्वाज, मंदिर के परिसर में सफेद कपड़े से ढकी मूर्तियों को दिखाते हुए कहते हैं, “हम इस साल अक्टूबर में दशहरे के बाद मंदिर में राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां स्थापित करेंगे। ग्रामीण उन्हें स्थापित करना चाहते हैं।” महाकाव्य में, राम और रावण की सेनाओं के बीच युद्ध के चरम पर, राम ने रावण को एक तीर से मारा, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। इसे अक्सर बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है।

लेकिन ग्रामीणों की घटनाओं की एक अलग व्याख्या है। भीर सिंह कहते है कि राम ने रावण को नहीं मारा। बल्कि, उन्होंने दानव राजा को मुक्त कर दिया। भीर सिंह कहते हैं, “उन्होंने रावण को इस दुनिया से मुक्त किया और उसे स्वर्ग में भेज दिया।” जन्म के चक्र से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म जैसे भारतीय धर्मों के प्रमुख सिद्धांतों में से एक है। सिंह कहते हैं, “हम राम का सम्मान करते हैं क्योंकि वह हमारे भगवान हैं, और हम रावण की पूजा करते हैं क्योंकि वह हमारे पूर्वज हैं।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: