लोग जब बीमार होते हैं तो उन्हें लगता है कि डॉक्टर उन्हें बचा लेंगे। लेकिन जब यही डॉक्टर पढ़ाई कर रहे होते हैं तो वे बेहद मुश्किल दौर से गुजरते हैं। मेडिकल छात्रों को विभिन्न कारणों से लंबे समय तक तनाव का सामना करना पड़ता है जिसके चलते उन्हें कई बार आत्महत्या तक के विचार आते हैं। चिंताजनक बात यह है कि इस मामले में उनकी स्थिति आम लोगों से कहीं ज्यादा खतरनाक है।
मेडिकल के छात्र मुश्किल दौर से गुजरते हैं
इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। 37 हजार मेडिकल छात्रों से उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बात की गई: इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा मेडिकल छात्रों में बढ़ते तनाव के अध्ययन के लिए बनी नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। 2024 में इस टास्क फोर्स ने देश भर के मेडिकल कॉलेजों में अध्ययनरत 37 हजार मेडिकल छात्रों से उनके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बात की। इनमें एमबीबीएस और पीजी के छात्र शामिल थे।
27 फीसदी छात्र मानसिक समस्या से जूझ रहे
रिपोर्ट के अनुसार, 27.8 फीसदी एमबीबीएस छात्र किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे थे। इनमें से 16.2 प्रतिशत ने माना कि उनके मन में आत्महत्या करने का विचार आता है। जबकि पीजी कर रहे मेडिकल छात्रों में 15.3 फीसदी किसी न किसी मानसिक समस्या से जूझ रहे थे। पीजी कर रहे 31.2 फीसदी छात्रों ने माना कि उनके मन में आत्महत्या करने के विचार आते हैं। आम लोगों पर हुए अध्ययन की बात करें तो 10.6 प्रतिशत लोगों को आत्महत्या के विचार आते हैं।
टास्क फोर्स ने अपनी रिपोर्ट में इस खतरे से निपटने के लिए कई सुझाव दिए थे। इनमें सप्ताह में अधिकतम 74 घंटे की ड्यूटी, शिक्षकों को प्रशिक्षण, एमबीबीएस पाठ्रयक्रम में मानसिक रोगों की पढ़ाई और छात्रों को उचित भुगतान करने की सिफारिश की थी। साथ ही हर पखवाड़े इन उपायों के क्रियान्वयन की समीक्षा करने की सिफारिश भी की थी। इन्हें देश भर में लागू किया गया है।