डंके की चोट पर : बिल का क्या होगा समय बताएगा, किसानों ने दिल्ली की जमीन पर सत्याग्रह के बीज जरूर बो दिए हैं..

रणघोष खास. देशभर से


दिल्ली की सरज़मीं पर पहुंचकर पंजाब के किसान नेतृत्व ने अपने आंदोलन की राजनीति के साथ-साथ आंदोलन की संस्कृति का भी रंग बिखेर दिया। नेतृत्वकारी पंजाब के किसानों के दिल्ली पहुंचने  का राजनीतिक और सांस्कृतिक रंग आहिस्ता-आहिस्ता पूरे देश में बिखरने लग गया। आज हालत यह है कि पूरे देश का किसान पंजाब के किसान आंदोलन के पीछे कतारबंद होने लग गया है। उन्होंने अपनी यह रणनीति प्रत्यक्षतः गाँधी से सीखी या नहीं लेकिन इतना तय है कि उन्होंने गाँधी सरीखे राजनीतिक और सांस्कृतिक सत्याग्रह को दिल्ली की धरती पर बो दिया। आज़ादी के बाद के युग में ‘दिल्ली चलो’ का आह्वान बहुत बार हुआ है लेकिन दिल्ली पहुँचकर वे यहाँ स्थायी भाव से जम नहीं गए। आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि आंदोलनकारियों ने दिल्ली के भीतर अपना समानांतर शहर बसाया हो और न समानांतर नागरी सभ्यता और संस्कृति की स्थापना की हो। गाँधी युग के बाद ऐसा भी कभी नहीं हुआ कि इन किसानों का साथ देने के लिए पंजाब (और कालांतर में हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड) के खेतिहर मज़दूरों के अलावा स्थानीय आढ़तिया, छोटा दुकानदार, कृषि औज़ारों के निर्माता, शिक्षक, लेखक, कवि, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, फ़िल्म निर्माता, अभिनेता और स्क्रिप्ट लेखकों का जमावड़ा-संक्षेप में समूचा मध्यवर्ग आंदोलन की परिधि के भीतर उनके पक्षधर की हैसियत से आ गया। जिस तरह भारत सहित सारी दुनिया में चर्चित पंजाबी के नामचीन गायकों और संगीतकारों ने इन दिनों दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर डेरा जमा लिया है। वहाँ मौजूद लाखों किसानों की मुश्किलों से भरी ज़िंदगी के पक्ष में बने गीतों को वे सब गा रहे हैं। टेंटों और ट्रैक्टर ट्रॉलियों में आबाद किसानों के ये शहर दिल्ली के स्वार्थमय और गलाकाट महानगर सहित सारे देश को बता रहे हैं कि हम आंदोलनकारी किसानों के बीच कैसा प्रेम, और सांस्कृतिक भाईचारा और शहादत व क़ुर्बानी का भाव और राजनीतिक समझ के सम्बन्ध हैं। गाज़ीपुर के बॉर्डर पर मुज़फ्फरनगर जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहरों से आए वे राम और रहीम एक साथ लंगर ‘चख’ रहे हैं जिन्हें गंदी राजनीति कल तक एक-दूसरे के ख़ून का स्वाद चखने को मजबूर करती थी। सांप्रदायिक संस्कृति को चकनाचूर करके किसानी लूट के विरोध के आंदोलन की कोख से निकली यह साझा संस्कृति है। इससे ज़्यादा आश्चर्यजनक स्थिति और क्या होगी कि गांधी के गुजरात में जन्मे नरेंद्र मोदी न तो किसान सत्याग्रह की ऐतिहासिक सामर्थ्य का आकलन कर सके और न ही पंजाब की धरती पर जन्म लेने वाले शूरवीरों के ऐतिहासिक जुझारूपन का। उनके लिए यह कल्पनातीत है कि दिल्ली बॉर्डर पर गांधी के अवतारों का जन्म हो सकता है? 

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