सीधी सपाट बात: पत्रकार का अपमान करने वालों की नजर में लोकतंत्र मजाक है, इसे रोकना ही पड़ेगा

रणघोष खास. पत्रकार की कलम से


मौका लगते ही पत्रकारों के सम्मान और स्वाभिमान पर हमला करने की मानसिकता क्या सोचकर जन्म लेती है। इसके पीछे क्या एजेंडा है। जानबूझकर ऐसा किया जा रहा है या अनजाने में ऐसी गलतियां हो रही है। इन तमाम सवालों पर गंभीर होना जरूरी हो गया है। रेवाड़ी जिले का मीडिया जिसकी सकारात्मक सोच की मिशाल दी जाती रही है। सुबह- शाम अखबारों में प्रकाशित खबरें एवं चैनलों की कवरेज  प्रशासन के साथ परस्पर तालमेल की गवाह बनती है। कोरोना काल हो या सर्दी गरमी या फिर बरसते पानी के दरम्यान जब चारों तरफ सन्नाटा छा जाता है तो सड़कों पर एक पत्रकार ही होता है जो किसी कोने में दबी कुचली आवाज को ताकत देकर लोकतंत्र की मर्यादा को बनाए रखता है। शुक्रवार को रेवाड़ी के मीडिया सेंटर में पत्रकारों ने पिछले दिनों प्रशासन एवं कुछ विभागों के अधिकारियों की अनदेखी एवं दुर्व्यवहार पर अपने कड़े अनुभव सांझा किए तो साफ हो गया कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई ओर नहीं वहीं लोग हमला कर रहे है जिन्हें उन्हें बचाने की जिम्मेदारी दी हुई है। सूचना की इस क्रांति में अगर कोई अधिकारी बेवजह यह भ्रम पाल ले कि उसके बिना सूचना नहीं मिलेगी या दबा ली जाएगी। समझ लिजिए वह लोकतंत्र की साफ सुथरी हवा को प्रदूषित करने का काम कर रहा है। नगर निकाय चुनाव में प्रशासनिक अधिकारियो की तरफ से पत्रकारों की अनदेखी जानबूझकर की गई थी या अनजाने में इसके पीछे के सच को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि कहीं ना कहीं कोई शख्स पर्दे के पीछे पत्रकार और सिस्टम के बीच में टकराव पैदा करना चाह रहा है। वह कौन है यह ईमानदारी से की गई जांच से पता चल जाएगा। सोचिए पत्रकार प्रशासन से क्या चाहता है सम्मान के साथ अपनी डयूटी के प्रति जिम्मेदारी एवं जवाबदेही में छिपे सवालों के जवाब। अधिकारी यह क्यों भूल जाते हैं कि वे जनता के सर्विस प्रोवाइडर है ना कि साहब, मालिक। उन्हें तो फक्र होना चाहिए कि मीडिया उनके छोटे से प्रयासों को जनमानस में विश्वास कायम करने का सशक्त माध्यम होता है। वे क्यों भूल जाते हैं कि जिस मीडिया से उन्हें पल- पल सूचनाएं ओर उनके काम करने के तौर तरीकों को ताकत मिलती है वे अपने अह्म के चलते उनके सम्मान और स्वाभिमान को ठेस पहुंचाना शुरू कर देते है। अगर यह उनकी मानसिकता में आता है तो समझ जाइए लोकतंत्र को बचाए रखने की एक ओर लड़ाई लड़ने का समय आ चुका है।  

 

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