बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार लाई नया अध्यादेश, जुलाई-अगस्त हिंसा के आरोपियों के केस रद्द, अल्पसंख्यकों के हत्यारे भी शामिल।
बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार एक बार फिर गंभीर विवादों में घिर गई है। सरकार ने एक ऐसा अध्यादेश लागू किया है, जिसके तहत जुलाई–अगस्त के दौरान हुई हिंसा में शामिल आरोपियों के खिलाफ दर्ज सभी मुकदमे रद्द कर दिए जाएंगे। विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इस फैसले से अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं के हत्यारों और कट्टरपंथियों को खुली छूट मिल गई है।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने ‘जुलाई अपराइजिंग (प्रोटेक्शन एंड लायबिलिटी डिटर्मिनेशन) अध्यादेश 2026’ लागू किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कानून मंत्रालय ने रविवार रात इसका गजट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इस अध्यादेश के तहत प्रदर्शन और हिंसा के दौरान दर्ज सभी आपराधिक मामलों को खत्म कर दिया जाएगा। इसके अलावा यदि कोई आरोपी जेल में बंद है तो उसे तत्काल रिहा करने का प्रावधान भी किया गया है।
अल्पसंख्यकों और पुलिसकर्मियों के हत्यारे भी होंगे रिहा
इस अध्यादेश को लेकर सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि जिन लोगों को राहत दी जा रही है, उनमें अल्पसंख्यकों, पुलिसकर्मियों और अवामी लीग के कार्यकर्ताओं की हत्या के आरोपी भी शामिल हैं। आरोप है कि सरकार ने जिन पर नरमी दिखाई है, उनमें बड़ी संख्या उन कट्टरपंथी तत्वों की है, जो हिंसा और तोड़फोड़ में सक्रिय रूप से शामिल थे।
आलोचकों का कहना है कि यह फैसला न केवल पीड़ितों के साथ अन्याय है, बल्कि इससे बांग्लादेश में कानून-व्यवस्था और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
संविधान से टकराता अध्यादेश?
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिम सरकार का यह अध्यादेश बांग्लादेश के संविधान की मूल भावना से मेल नहीं खाता। ऐसे समय में, जब देश आम चुनाव की ओर बढ़ रहा है, इस तरह का फैसला राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर सकता है।
गौरतलब है कि बांग्लादेश में आरक्षण को लेकर शुरू हुआ आंदोलन इतना उग्र हो गया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को पद छोड़ना पड़ा। हालात इतने बिगड़े कि उन्हें भारत में शरण लेकर अपनी जान बचानी पड़ी। अब चुनावी माहौल में यह अध्यादेश कई नए सियासी सवाल खड़े कर रहा है।
जुलाई–अगस्त हिंसा: मौत और आग का तांडव
बीते साल जुलाई और अगस्त के दौरान बांग्लादेश में व्यापक हिंसा देखने को मिली थी। कई पुलिस थानों में आग लगा दी गई थी, पुलिसकर्मियों को पीट-पीटकर मार डाला गया था और अल्पसंख्यकों को खास तौर पर निशाना बनाया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस हिंसा में दर्जनों पुलिसकर्मी मारे गए थे।
डेढ़ साल बीत जाने के बावजूद बांग्लादेश में हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं। अब भी अल्पसंख्यकों पर हमलों की खबरें सामने आती रहती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई जा रही है।
शेख हसीना के भाषण पर सरकार की नाराजगी
इस बीच अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत से दिए गए एक ऑडियो भाषण ने भी बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को नाराज कर दिया है। सरकारी समाचार एजेंसी बीएसएस के अनुसार, ढाका में जारी बयान में विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह इस बात से ‘आश्चर्यचकित’ और ‘स्तब्ध’ है कि शेख हसीना को नई दिल्ली में सार्वजनिक मंच से बोलने और अंतरिम सरकार के खिलाफ राजनीतिक टिप्पणी करने की अनुमति दी गई।
बयान में यह भी कहा गया कि बार-बार अनुरोध के बावजूद शेख हसीना को बांग्लादेश सौंपने का मामला आगे नहीं बढ़ा है, उल्टे उन्हें भारतीय धरती से राजनीतिक बयान देने की छूट दी जा रही है। सरकार का आरोप है कि इस तरह की गतिविधियां दोनों देशों के बीच गैर-हस्तक्षेप और अच्छे संबंधों के सिद्धांतों के खिलाफ हैं।
बढ़ती चिंता, गहराता विवाद
कट्टरपंथियों के मामलों को रद्द करने वाला यह अध्यादेश बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के इरादों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, कानून का राज और न्याय की उम्मीद—इन सभी मुद्दों पर यह फैसला दूरगामी असर डाल सकता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि इस अध्यादेश पर देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कैसी प्रतिक्रिया सामने आती है।