जनता की स्थिति द्रोपदी जैसी..
रणघोष खास. सुभाष चौधरी
10 मई को नगर निकाय मतदान के तीन दिन बाद छोटे बड़े शहरों को नई सरकार मिल जाएगी। कुछ चेहरे नए होंगे तो कुछ पुराने। बदलेगा कुछ नही बस नई दुल्हन आने पर कुछ दिनों तक सबकुछ हरा हरा नजर आएगा। बाद में सास भी कभी बहु थी या बहु को भी सास बनना है वाले सीरियल की तरह आरोप प्रत्यारोप की नई नई कहानियां शुरू हो जाएगी।
इस बार नगर परिषद रेवाड़ी व धारूहेड़ा में चुनाव को लेकर जो मौजूदा तस्वीर नजर आ रही है उसमें भाजपा की तरफ से जीत का शोर मचाया जा रहा है जबकि कांग्रेस खामोशी में इसलिए मुस्करा रही है की उसकी स्थिति पहले से बेहतर ही होगी। कितनी होगी यह बता पाना मुश्किल हो गया है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह है की 12 साल सत्ता से बाहर रहने के बाद भी भाजपा ने अपने क्रिया कलापों से उसे बराबर का प्रतिद्धंदी माना हुआ है। भाजपा के पास उम्मीदवार बदलने के अलावा ऐसा कोई दावा नही है जिसको लेकर वह सीना चौड़ा करके यह बता सके की शहर की तस्वीर पहले से बेहतर हुई है। उसके लिए सबसे अच्छी बात यह है की कांग्रेस ने यहा लंबे समय तक राज किया। उसके पास भी बताने के लिए कुछ नही है। दोनों दलों में एक बात कॉमन है की भ्रष्टाचार को लेकर एक दूसरे पर हमला जरूर कर रहे हैं जबकि दोनों के राज में नगर परिषद काजल की कोठरी बनी हुई थी जिसमें से कोई आज तक बेदाग होकर नही निकला है। इसलिए जनता यह समझ नही पा रही है की कांग्रेस के समय में हुआ भ्रष्टाचार ज्यादा ईमानदार था या भाजपा के शासनकाल में हुआ भ्रष्टाचार जय श्री राम, हर हर महादेव की गूंज में साफ सुथरा हो गया। इसलिए दोनों में किसी एक के बनने से शहर की तस्वीर पहले से बेहतर हो जाएगी। यह भरोसा इसलिए मजबूत नही हो रहा है की दोनो प्रत्याशियों के पास नगर परिषद में काम करने का लंबा अनुभव रहा है। अपने अपने वार्ड से पार्षद भी रहे हैं। एक प्रत्याशी तो कुछ समय के लिए चेयरपर्सन पद पर भी पहुंची है। अगर खुद की बेहतर सोच के साथ आदर्श स्थापित करना होता तो अपने वार्ड को बेहतर उदाहरण के तोर पर पेश कर सकते थे। कमाल देखिए दोनो ही प्रमुख प्रत्याशी वार्ड तीन से एक दूसरे के खिलाफ पार्षद का चुनाव लड़ते आ रहे हैं। इस सीट का असल सच यह है की चेयरपर्सन की सीट केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की प्रतिष्ठा का सवाल बन चुकी है। कांग्रेस की तरफ से पूर्व मंत्री कप्तान अजय सिंह यादव के लिए यह सीट जीतना इसलिए जरूरी है की भविष्य की राजनीति में कही दुबारा अंधेरा नही छा जाए। इसके अलावा एक मजबूत धड़ा ऐसा भी है जो लंबे समय तक राज करते आ रहे इन दोनो परिवारों से रेवाड़ी को आजाद कराने के लिए भीतरखाने हमला करने की तैयारी कर चुका है। 2019 के विधानसभा चुनाव में राव इंद्रजीत सिंह इस हमले का खामियाजा भुगत चुके हैं। लगभग वही स्थिति इस चुनाव में बन चुकी है। हमला कितना कारगर होगा यह 13 मई के नतीजों से पता चल जाएगा। इतना जरूर है की सबकुछ होते हुए भी भाजपा के लिए यह जीत अलग अलग वजहों से अब आसान नही है। जहां तक जनता की बात है उसकी स्थिति आज की उस द्रोपदी की बन चुकी है जिसके लिए यह समझ पाना अभी मुश्किल हो रहा है की कौरवो व पांडवों में सबसे बड़ा दोष किसका था। जिस पांडवों के सानिध्य में वह खुद को सुरक्षित महसूस कर रही थी उन्होंने उसे जुए में लगा दिया। जिस कौरवो के साथ भीष्म पितामाह, गुरु द्रोणाचार्य, विदुर जैसे महान पराक्रमी, कर्तव्यनिष्ठावान नजर आ रहे थे। उनके रहते उसके साथ कुछ भी गलत नही होगा। लेकिन वह तो दोनों से ही छली गईं। उस समय द्रोपदी की लाज बचाने के लिए एक पुकार पर भगवान श्रीकृष्ण आ गए थे। आज कौन आएगा। इसकी संभावना इसलिए कम है की जनता भी खुद के प्रति इतनी ईमानदार व जवाबदेह नही है की उसकी पुकार में वह ताकत महसूस हो जो बेहतर बदलाव का आगाज बन जाए।