अविनाश साबले : पिता ईंट भट्टा में मज़दूर, बेटे ने बाधाओं को पार
रणघोष. बीबीसी से नितिन सुल्ताने की रिपोर्ट
पेरिस ओलंपिक में पांच अगस्त को भारत के अविनाश साबले ने इतिहास रच दिया. अविनाश साबले 3000 मीटर स्टीपलचेज़ यानी बाधादौड़ के फ़ाइनल में पहुंच गए हैं. अविनाश ऐसा करने वाले पहले भारतीय पुरुष हैं. स्टीपलचेज़ में फ़ाइनल के लिए तीन रेस यानी हीट होती हैं. हर रेस से पांच एथलीट फ़ाइनल में पहुंचते हैं. इस तरह फ़ाइनल में पहुंचने वालों की संख्या 15 होती है. स्टीपलचेज़ में फाइनल आठ-नौ अगस्त की रात को सवा एक बजे के क़रीब होगा. अविनाश ने पेरिस ओलंपिक में जो इतिहास रचा है, उसकी नींव कई साल पहले से रखनी शुरू हो गई थी. अविनाश का संघर्ष इसकी गवाही देता है.
अविनाश से भारत को है मेडल की उम्मीद
स्टीपलचेज रेस में बर्मिंघम के रनिंग ट्रैक पर लाखों भारतीयों की एक मेडल की उम्मीद पर खरा उतरने एक युवा दौड़ लगा रहा था.इन सबसे अनजान उस युवक के माता-पिता महाराष्ट्र के बीड जिले में एक छोटे से गाँव के खेत में रोपनी के काम में लगे हुए थे.तीन हजार मीटर के स्टीपलचेज रन के शुरुआती दौर में तो यह युवक चौथे स्थान पर था. लेकिन अंतिम 500 मीटर के दौड़ में उसने ऐसी गति पकड़ी कि मानो उसने केन्याई धावकों के गले से मेडल छीन लिया हो.हालांकि गोल्ड मेडल से तो वो युवक माइक्रो सेकेंड्स से चूक गया लेकिन उसने अपनी परफॉरमेंस को अप्रत्याशित और ऐतिहासिक बना दिया.ये भारत के अविनाश साबले की कहानी है. फ़ाइनल में पहुंचे अविनाश से भारत को अब मेडल की उम्मीद है.लेकिन अविनाश की यात्रा कभी आसान नहीं रही.स्कूल की धूल भरी सड़कों पर नंगे पाँव दौड़ते हुए पेरिस के ट्रैक तक पहुँचने की अविनाश की कहानी बहुत कठिन रही है.
आइए अविनाश की पेरिस ओलंपिक तक की यात्रा को समझते हैं
13 सितंबर 1994 को जन्मे अविनाश महाराष्ट्र के बीड जिले में अष्टि तालुका के एक छोटे से गांव मंडवा से आते हैं.वैशाली और मुकुंद साबले के गरीब परिवार में जन्मे अविनाश की कहानी गरीबी और उससे संघर्ष की रही है. एबीपी माँझा को दिए एक इंटरव्यू में अविनाश ने कहा था कि ईंट भट्टे में काम करनेवाले उनके माता-पिता ने हमेशा से अपने बच्चों को शिक्षा देने को महत्व दिया.
तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े अविनाश पाँच से छह साल की आयु में ही अपने माता-पिता की मुश्किलों को समझ गए थे. अविनाश कहते हैं, “मेरे माता-पिता ईंट भट्टे पर काम करने जाते थे. इसलिए हम लोगों के जागने से पहले ही सुबह माँ खाना बनाकर पिता के साथ काम पर निकल जाती थीं. एक बार सुबह घर से निकलने के बाद हम लोग उन्हें सिर्फ रात में ही मिल पाते थे जब वो वापस आते थे. उन्हें ऐसे देखकर हमें उनके कठिन परिश्रम का अंदाजा था.”परिवार की ऐसी स्थिति देखकर अविनाश के मन में अपने माता-पिता के संघर्ष में हाथ बँटाने की इच्छा बचपन से ही थी. इसलिए स्पोर्ट्स में शुरुआती असफलता के बाद अविनाश ने सेना जॉइन करने का फैसला किया. लेकिन नियति ने अविनाश को एक बार फिर से रेसिंग के ट्रैक पर ला दिया.
अविनाश को दौड़ने की आदत बचपन से थी
अविनाश को दौड़ने की आदत बचपन से ही लग गई थी.हालांकि दौड़ने की शुरुआत तो अविनाश ने बचपन में ज़रूरत के रूप में की थी लेकिन यही ज़रूरत उनके शौक में तब्दील हो गई.घर से स्कूल की दूरी छह से सात किलोमीटर होने के कारण अविनाश देर हो जाने पर दौड़ते हुए स्कूल जाते थे और तभी से दौड़ना उन्हें अच्छा लगने लगा.अविनाश को दौड़ते हुए स्कूल जाते देख शिक्षकों ने उनकी रेस उनसे बड़ी कक्षा के छात्र के साथ करवाई, जिसमें अविनाश के जीतने के बाद शिक्षकों ने उनकी स्पोर्ट्स ऐक्टिविटी पर भी ध्यान देना शुरू किया.शिक्षक अविनाश को 500 मीटर की रेस में ले गए. उस समय अविनाश प्राइमरी के छात्र थे और उनकी आयु तब मात्र नौ साल थी.हालांकि इस रेस को लेकर अविनाश ने कोई तैयारी नहीं की थी. मगर अविनाश ने शिक्षकों को निराश भी नहीं किया.अपने जीवन की पहली रेस अविनाश जीत चुके थे. रेस जीतने के साथ साथ अविनाश ने सौ रुपये का नकद इनाम भी जीता.इसके बाद अविनाश को शिक्षक दो साल धनोरा मैराथन ले गए थे. इसमें भी अविनाश दोनों बार रेस में विजयी हुए.एक इंटरव्यू में अविनाश ने कहा कि उन्हें सारे काम दौड़ते हुए करना अच्छा लगता था.अविनाश पढ़ाई में भी उतने ही अच्छे और तेज थे.स्कूल में हमेशा वो प्रथम या फिर द्वितीय स्थान लाते थे.इस कारण से भी अविनाश को शिक्षकों का विशेष स्नेह मिलता था.
अविनाश के लिए यह दोहरे झटके जैसा
स्पोर्ट्स के क्षेत्र में प्रवेश के लिए शिक्षकों के मार्गदर्शन के अनुसार, अविनाश ने सातवीं कक्षा में महाराष्ट्र क्रीडा प्रबोधिनी में दाखिले के लिए परीक्षा भी दी. महाराष्ट्र क्रीडा प्रबोधिनी में दाखिले से छात्रों को मुफ़्त शिक्षा और ट्रेनिंग मिलती है.अविनाश परीक्षा में तो सफल हो गए लेकिन कद में छोटे होने के कारण बढ़िया परफ़ॉर्म नहीं कर पाए.हालांकि प्रबोधिनी ने अविनाश को दसवीं के बाद और चार साल का मौका दिया लेकिन उनके परफ़ॉर्मेंस में सुधार नहीं आया. जिसके कारण अविनाश को प्रबोधिनी से बाहर होना पड़ा. अविनाश के लिए यह दोहरे झटके जैसा था. एक तो अविनाश ने स्पोर्ट्स के कारण पढ़ाई पर भी ध्यान नहीं दिया और अब प्रबोधिनी से भी बाहर होना उनके लिए दोहरे झटके से काम नहीं था.इसलिए दसवीं के बाद अविनाश ने अपने माता-पिता के काम में हाथ बँटाना चाहा जबकि उनके मित्र पढ़ाई में आगे बढ़ रहे थे.हालांकि अविनाश के माता-पिता ने जमीन बेचकर पढ़ाने का प्रस्ताव दिया जो अविनाश को अच्छा नहीं लगा.अविनाश ने पढ़ाई के साथ-साथ अपने चाचा के साथ सौ रुपये की दिहाड़ी पर मिस्त्री का काम करने का फैसला किया.अपने बारहवें साल में, अविनाश ने सुबह में अपना कॉलेज जारी रखा तो दोपहर में मजदूरी का काम किया. लेकिन फुल टाइम काम नहीं करने के कारण अविनाश को 150 के बदले सौ रुपये ही मिलते थे.जीवन में अपनी पहले रेस में सौ रुपये का इनाम जीतने से लेकर अब तक सौ रुपये रोज की नौकरी ने अविनाश को बहुत कुछ सिखाया.
सेना भर्ती परीक्षा में अविनाश सफल रहे
बारहवीं पास करने के बाद अविनाश के जीवन में फिर एक नया मोड़ आया.सेना भर्ती परीक्षा में अविनाश सफल रहे.सेना में प्रवेश अविनाश के लिए एक नए और अलग तरह के जीवन की शुरुआत साबित हुई. इन चार सालों में, कई जगहों पर ड्यूटी करते हुए अविनाश ने कठिन प्रशिक्षण हासिल किया.ओलंपिक वेबसाइट के मुताबिक, सेना में अपनी सेवाओं के शुरुआती दो साल में अविनाश ने जहां एक तरफ बर्फ जमाने वाली ठंडी जगह सियाचिन में काम किया तो वही भीषण गर्मी वाले राजस्थान में भी कठिन परिस्थियों में सेवाएँ दी.2015 में अविनाश ने दौड़ की तरफ फिर से रुख किया.एक साल की ट्रेनिंग के बाद सेना के नेशनल क्रॉस कन्ट्री रेस प्रतियोगिता में पांचवें स्थान पर आए.यही से फिर से अविनाश ने पीछे न मुड़ते हुए जीतने की ठानी.लेकिन सेना में 24 साल की उम्र में अविनाश का बढ़ा वजन उनके लिए चिंता का कारण बन गया था.इसलिए उन्होंने अपना वजन घटाने के लिए जब भी समय मिला चाहे सुबह के तीन बजे हो या दोपहर के बारह बजे हों वो दौड़ने जाने लगे.अविनाश ने अपना 15 किलो वजन कम कर लिया.
अविनाश ने 30 साल के रिकॉर्ड को तोड़ा
क्रॉस कन्ट्री प्रतियोगिता के बाद अविनाश ने पुणे में सेना चैंपियनशिप में भाग लिया, जहां वो स्टीपलचेज प्रतियोगियों के साथ अभ्यास करने लगे.इसी दौरान कोच अमरीश कुमार की नजर अविनाश पर पड़ी.हालांकि अविनाश 5000 और 10 हज़ार मीटर की दौड़ में भाग लेना चाहते थे लेकिन कोच अमरीश ने अविनाश के स्टाइल को देखते हुए स्टीपलचेज में शामिल होने की सलाह दी.कोच अमरीश कहते हैं, “वहाँ कई एथलीट थे लेकिन अविनाश के कठिन मेहनत और उनके बैकग्राउंड से और कठिन मेहनत करने की उनकी इच्छा का पता चला. उनका बॉडी स्ट्रक्चर भी यूनीक था जिसके कारण वो स्टीपलचेज के लिए चुने गए.” अविनाश को अमरीश की ट्रेनिंग का फायदा मिला.2018 के नेशनल चैंपियनशिप में अविनाश साबले ने 3000 मीटर के स्टीपलचेज में 30 साल के रिकॉर्ड को तोड़ दियाभुवनेश्वर में हुए इस इवेंट में अविनाश ने गोपाल सैनी के 1981 के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए एक नया रिकॉर्ड बनाया.इस रेस को अविनाश ने 8.29.88 मिनट में पूरा किया जो गोपाल सैनी से .12 सेकंड कम था.इसके बाद 3000 के स्टीपलचेज में अविनाश ने एक नहीं, नौ-नौ बार राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया.
सफलता के साथ संघर्ष भी जारी रहा
एक तरफ जहां अविनाश के लिए नए अवसरों के दरवाजे खुल रहे थे तो दूसरी तरफ अविनाश के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं थीं.एक इंटरव्यू में अविनाश ने कहा- जब ट्रेनिंग शुरू हुई तो वेतन 18-20 हजार रुपये ही था. घर पैसे भेजने के कारण पैसे बच नहीं पा रहे थे. यहाँ तक कि जूते और ट्रेनिंग के लिए भी बहुत बार सोचना पड़ता था.इसलिए उन्होंने मैराथन में दौड़ना शुरू किया जहां से मिली पुरस्कार राशि से अपनी ज़रूरतों को पूरा कर सकें.अविनाश कहते हैं, “10,000 से 20,000 इनाम राशि वाले मैराथन में मैं दौड़ा करता था. होटल में रहने की बजाय मैं उस समय मैराथन के टेंट में सोकर पैसे बचा लेता था. मेरे लिए इन प्रतियोगिताओं में इनामी राशि जितना बहुत महत्वपूर्ण था. ऐसे ही कुछ मैराथन जीतने के बाद बहन की शादी और एक छोटा घर भी बन पाया.”
पहले प्रयास में ही मिला अंतरराष्ट्रीय मेडल
अविनाश पर कोच अमरीश कुमार के साथ-साथ रूस के निकोलाई सनेसरेव ने भी काफी मेहनत की.परिणाम ये रहा कि 2019 के फेडरेशन कप में फिर उसके बाद दोहा में आईएएएफ वर्ल्ड चैम्पियनशिप में अविनाश ने बहुत बढ़िया प्रदर्शन किया.2019 में अविनाश ने पहले अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हुए दोहा के एशियन एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में अविनाश ने अपने पहले प्रयास में ही दो सिल्वर मेडल जीत लिए.इसी प्रतियोगिता में अविनाश ने अपने ही नेशनल रिकॉर्ड को दो बार तोड़ा. इस प्रतियोगिता में ही अविनाश ने टोक्यो ओलंपिक के लिए भी क्वालिफाई किया.1952 में गुलजारा सिंह के बाद अविनाश पहले भारतीय थे जिन्होंने ओलंपिक में स्टीपलचेज के लिए क्वालिफाई किया था.हालांकि उस ओलंपिक में अविनाश अपने क्षमता के अनुरूप अपना बढ़िया प्रदर्शन नहीं दे पाए.अविनाश कहते हैं कि दो बार कोविड होने के कारण और उसके बाद आई कमजोरी के कारण वो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए.
गोल्ड मेडल पाते पाते रह गए
टोक्यो ओलंपिक में असफलता के बाद अविनाश ने फिर से कठिन मेहनत की.2022 के बर्मिंघम में कॉमनवेल्थ खेलों में अविनाश ने फिर से राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाते हुए सिल्वर मेडल हासिल किया.इस प्रतियोगिता में अविनाश महज 0.5 सेकंड से गोल्ड मेडल चूक गए थे.इस जीत के बाद अविनाश की तारीफ विशेष तौर पर खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी.कॉमनवेल्थ खेलों के 3000 मीटर के स्टीपलचेज में भारत का यह पहला मेडल था.कई अच्छे प्रदर्शनों के कारण 2023 अविनाश के लिए विशेष रहा.सिलेसिया डायमंड लीग टूर्नामेंट में अपने प्रदर्शन की बदौलत अविनाश 2024 के ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर गए.हांगझोऊ में 2023 के एशियन गेम्स में अविनाश ने नया रिकॉर्ड बनाकर गोल्ड मेडल जीत लिया. यहाँ भी उन्होंने 8:19.20 का नया रिकॉर्ड बनाया.ठीक इसी समय अविनाश ने 5000 मीटर के ईवेंट में 30 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया.इसी गेम में अविनाश ने सिल्वर मेडल जीता. इस केटेगरी में 13:18.92 मिनट का रिकॉर्ड भी अविनाश के नाम है.2020 में दिल्ली हाफ मैराथन में हिस्सा लेते हुए, 1:00:30 घंटे में अविनाश ने हाफ मैराथन जीत कर इसमें भी एक नया रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया.अविनाश एकलौते भारतीय धावक हैं जिन्होंने 61 मिनट से भी कम समय में हाफ मैराथन पूरा किया.2022 में अविनाश को अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. अविनाश ने एक बार कहा था, ”जब आप किसी रेस में दौड़ते हैं खासकर बड़ी रेस में तो आप सब कुछ याद रखते हैं. आपके संघर्ष से लेकर आपके दर्द सब याद रहते हैं आपको. इन सबके बाद भी आप को अपना फोकस अपने गोल पर रखना होता है. क्योंकि संघर्ष ही आपको आगे बढ़ने की ताकत देता है.”