भाजपा में बाड़ ही खेत को खा रही है, जीत तो भूल जाइए

प्रत्याशी हारे जीते कोई मतलब नही, कार्यकर्ता के लिए लखपति- करोड़पति बनने का मौका है 


रणघोष खास.  हरियाणा के सभी जिलों से

 हरियाणा विधानसभा चुनाव में पिछले तीन दिनों से जिला ओर विधानसभा स्तर पर भाजपा पदाधिकारियों द्वारा मीडिया के पास आफ दी रिकार्ड  जो सूचनाए पहुंच रही है वह हैरान करने वाली है। यह मसला चुनाव प्रबंधन के नाम पर हर जिले में पहुंचाई गई करोड़ों रुपए की राशि की बंदरबाट से जुड़ा हुआ है। यह बजट जिला कार्यालय एवं प्रत्याशियों के पास आते ही पदाधिकारी एवं कार्यकर्ताओं में खलबली सी मची हुई है। चूंकि सारा लेन देन चैक या बिल से नही होकर मौखिक तोर पर नगदी से हो रहा है इसलिए इसका कोई रिकार्ड भी नही रखा जा रहा है। इससे पहले लोकसभा चुनाव में भी बजट जारी हुआ था जिसमें कुछ जिला अध्यक्षों ने यह राशि खर्च करने की बजाय डकार ली थी और बाद में पता चलने पर कुछ को अपने पदों से हाथ धोना पड़ा था। इस बार यह राशि कई गुणा जारी हुई है जो बूथ को संभालने वाले आम कार्यकर्ता की सोच से बहुत ज्यादा है। उस राशि का पता चलते ही बूथ एजेंटों में भी आपसी होड़ मचनी शुरू हो गई है। पहले यह राशि ना के बराबर आती थी ओर समर्पित कार्यकर्ता ही मुश्किल से बूथ का थैला पकड़ने के लिए आगे आते थे। अब बैग के साथ व्यवस्था के नाम पर खर्च होने वाली अच्छी राशि को देखकर एजेंट बनने की होड़ मच रही है। चूंकि राशि का लिखित में कोई रिकार्ड नही है इसलिए जिसका जो जोर चल रहा है वह उसे निपटाने में लगा हुआ है। पहली बार बूथ स्तर पर कम से कम 5 हजार रुपए नगद एवं प्रचार सामग्री के नाम पर अलग से बजट दिया जा रहा है। बड़े स्तर पर यह खेल काफी बड़ा है।

 चुनाव प्रचार से ज्यादा खुद का जुगाड़ करने में पसीना बहा रहे भाजपाई

भाजपा प्रत्याशियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने ही कार्यकर्ताओं से आ रही है जो फील्ड में प्रचार करने की बजाय उसके साथ चिपके रहते हैं या कार्यालय में हुक्का और चाय पानी का आनंद ले रहे हैं। चूंकि चुनाव काफी हद तक जातिगत से होकर गौत्र तक की गरिमा तक पहुंच चुका है इसलिए कार्यकर्ताओं का डोर टू डोर अभियान होना चाहिए जबकि हो रहा है एकदम उलट। यहा तक की भाजपा पदाधिकारी अपने समाज में जाकर ही मीटिंग तक नही कर पा रहे हैं। वे प्रत्याशी के साथ फोटो करवाकर अपनी हाजिरी पूरी करते नजर आ रहे हैं। इससे कुछ प्रत्याशियों में गहरी नाराजगी है और वे हाईकमान को स्थिति से अवगत करा रहे हैं। खुलकर  नाराजगी इसलिए नही दिखा रहे की कहीं बड़ा नुकसान नही हो जाए।

 चंदा मांगने के मामले से हुआ यह खुलासा

इस चुनाव में भाजपा हाईकमान ने प्रबंधन के नाम पर हजारों करोड़ का बजट जारी किया है जो अभी तक का सबसे ज्यादा है ताकि कार्यकर्ताओं से लेकर पदाधिकारी एवं प्रत्याशियों को मानसिक ओर आर्थिक चुनौतियों का सामना नही करना पड़े। पहले बजट नही होने पर पार्टी पदाधिकारी क्षेत्र के उद्योगपतियों से चंदा लेते थे। इस बार पार्टी ने अपने स्तर पर अच्छा खासा इंतजाम करके दे दिया। इसके बावजूद भी पदाधिकारी चंदा लेने की प्रवृति को नही छोड़ पाए जबकि उनके पास उम्मीद से ज्यादा बजट पहुंच चुका था। अनेक भाजपा पदाधिकारियों ने नाम नही बताने की शर्त पर बताया की पार्टी के भीतर बजट को लेकर घमासान चल रहा है। कार्यकर्ता फील्ड में प्रचार से ज्यादा इस बात पर ज्यादा मेहनत कर रहे हैं की कौन कितना इस बजट को डकार रहा है। जिसे मिल गया है वह चुप है जिसे नही मिला वह मीडिया में जानकारी पहुंचाकर पोल खोलने का काम कर रहा है।

  अगर यही स्थिति रही तो भाजपा कही की नही रहेगी

 अगर यही स्थिति रही तो भाजपा उम्मीदवार का जीतना तो दूर स्थिति को संभालना मुश्किल हो जाएगा। वह निजी तोर पर इतना व्यस्त है की उसे दिन या रात का ही पता नही चल रहा है। अगर वह पूरी तरह से पार्टी प्रबंधन पर निर्भर है तो वह खतरे में हैं। अगर अपने  स्तर पर टीम बनाकर सक्रिय है तो काफी हद तक स्थिति संभल जाएगी।

कांग्रेस इस मामले में काफी बेहतर

कांग्रेस प्रत्याशियों का चुनाव प्रबंधन पार्टी प्रबंधन की बजाय सीधे तौर पर निजी हाथों में है। जहा बिखराव की स्थिति ना के बराबर है। वजह वितिय व्यवस्था को उम्मीदवार के पारिवारिक सदस्य संभाल रहे हैं। इसलिए वह निश्चिंत होकर चुनाव प्रचार में जुटा हुआ है।