सीधी सपाट बात : नगर परिषद अतिक्रमण हटा रही या चालान से लाखों वसूल रही है..

रणघोष खास. एक नागरिक की कलम से

शहर में कई सालों से अतिक्रमण के खिलाफ नगर परिषद की चलती आ रही रस्म अदायगी जब तक पूरी तरह से विवादित व टकराव वाली स्थिति में नही पहुंच जाए तब तक अधिकारी ओर कर्मचारियों की पाचन क्रिया ठीक नही रहती। बुधवार को मोती चौक पर पहुंचकर कर्मचारियों का हाजमा उस समय ठीक हुआ जब उन्होंने अपनी मनमानी ओर बदतमीजी दिखाते हुए पीली पटटी के भीतर रखे सामान का भी चालान कर दिया। इससे व्यापारियों में गुस्सा आना लाजिमी था ओर उन्होंने बाजार बंद कर दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर दी। खुद भाजपा के युवा नेता अमित यादव समेत अनेक भाजपाई व्यापारियों ने नप के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 

इस पूरे घटनाक्रम पर गौर करिए। पिछले चार पांच रोज से यह अभियान चल रहा है। चालान भी काटे जा रहे हैं। कार्रवाई के दौरान अधिकारी ओर कर्मचारियों का तोर तरीका इस तरह रहा मानो व्यापारी घुसपैठिए हो ओर ये देश के जाबाज सिपाही। शहर को बेहाल करने के लिए नगर परिषद का सिस्टम पूरी तरह से जिम्मेदार है। अगर ऐसा नही है तो बार बार अतिक्रमण के खिलाफ अभियान ओर चालान काटने की जरूरत क्यो पड़ती। यह अभियान कब तक चलेगा कुछ कहा नही जा सकता इतना जरूर है की यह पहले की तरह रस्म अदायगी बनकर रह जाएगा। जब तक  शहर के व्यापारिक संगठनों में यह विश्वास मजबूत नही होगा की नप के सिस्टम में ईमानदारी नजर आने लगी है तब तक अभियान में चालान के  नाम पर लाखों रुपए वसूले जाएंगे। इसमें कम ज्यादा कराने के नाम पर भी अलग से कर्मचारी ओर अधिकारी अपनी जेब गर्म करेंगे। साथ ही जब्त किए गए सामान को भी साहब की सेवा पानी के नाम पर पीछे के दरवाजे से दे दिया जाएगा। ऐसा होना नई बात नही है। यहा सवाल यह उठता है की नप ने कई सालों से चलती आ रही अपनी इस नाकाम अतिक्रमन कार्रवाई में बदलाव क्यों नही किया। वह हर बार एक ढर्रे पर चलकर कर्मचारियों की टीम को बाजार में भेजकर चालान कर सुर्खियां बटोरने के बाद चुप बैठ जाती है। क्या यह सीधे तोर पर अतिक्रमण

 के नाम पर चालान वसूली कमाई का जरिया तो नही है। कायदे से जब कोई अभियान लगातार चलाने के बाद भी सफल नही होता है तो उसमें बदलाव लाना चाहिए। यहा इसे एक तरह से साल में दो तीन बार चालान के नाम पर वसूली का खेल करने के अलावा कुछ नही है। इस पर नप के अधिकारियों को चाहिए की वे अपने इस अभियान के तौर तरीकों को बदले ओर व्यापारियों को पूरी तरह से विश्वास में लेकर ही शहर को अतिक्रमण से आजाद कराए। तभी नप अपना भरोसा कायम कर पाएगी नही तो उसकी स्थिति काजल की कोठरी जैसी पहले ही बन चुकी है।