हरियाणा के गुरुग्राम को ‘जलग्राम’ का नाम दे दिया जाए, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं कहलाएगी। हर बार कुछ ही मिनटों की बारिश में गुरुग्राम की जो हालत होती है, वह किसी से छिपी नहीं है। क्या सड़कें, क्या गाड़ियां और क्या करोड़ों रुपये के फ्लैट्स, सबकुछ जलमग्न हो जाता है। सोमवार को हुई मूसलाधार बारिश के बाद एक बार फिर ऐसा ही नजारा दिखा। स्कूली बच्चों से लेकर ऑफिस जाने वाले कर्मचारी परेशान दिखें और उन्हें घंटों जाम में फंसा रहना पड़ा। इसके बाद सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इन सब का जिम्मेदार कौन है?
इससे पहले सोमवार को करीब 75 मिमी बारिश ने कुछ ही घंटों में गुरुग्राम की सड़कों को तालाब में बदल दिया। गोल्फ कोर्स रोड जैसे देश के सबसे महंगे इलाकों में भी पानी भर गया। सोशल मीडिया पर कई पोस्ट्स में लोग इस आपदा को लेकर तंज कसते नजर आए। कई लोगों का कहना है कि गुरुग्राम की बारिश गरीबी और अमीरी का भेद भी मिटा देती है क्योंकि यहां करोड़ों के फ्लैट भी चुटकियों में पानी-पानी हो जाते हैं।
किन इलाकों में सबसे ज्यादा असर?
रिपोर्ट्स के मुताबिक नरसिंहपुर, हीरो होंडा चौक, राजीव चौक, इफ्को चौक, रेलवे रोड, सेक्टर-5, ओल्ड दिल्ली रोड, मेहरौली रोड और बसई रोड जैसे कई प्रमुख इलाकों में भारी जलभराव देखने को मिला। नाहरपुर अंडरपास डूब गया, जबकि सोहना रोड पर स्कूल बसें और एंबुलेंस तक पानी में फंस गईं। दिल्ली-गुरुग्राम एक्सप्रेसवे पर घंटों लंबा जाम लगा रहा।
सबसे ज्यादा मुश्किल बच्चों को हुई। कई स्कूल बसें पानी में घंटों फंसी रहीं और बच्चों को घर पहुंचने में 5 से 6 घंटे तक लग गए। इसके बाद जिला प्रशासन ने मंगलवार के लिए सभी सरकारी और निजी स्कूलों की कक्षाएं ऑनलाइन कर दीं। वहीं जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) ने निजी कंपनियों और कॉरपोरेट दफ्तरों को कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम देने की सलाह दी है।
कौन है जिम्मेदार?
इस साल मॉनसून में यह तीसरी बार है जब गुरुग्राम बारिश के बाद लगभग ठप हो गया। पहले जुलाई और फिर अगस्त की शुरुआत में भी भारी बारिश के बाद शहर में जलभराव, ट्रैफिक जाम और WFH की स्थिति बन गई थी। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर गुरुग्राम में इतना पानी क्यों भर जाता है?
सबसे बड़ी वजह है जवाबदेही की कमी। गुरुग्राम की सड़कें, नाले और अन्य कई अलग-अलग एजेंसियों के अधीन हैं। कहीं GMDA जिम्मेदार है, कहीं MCG, कहीं PWD, तो कहीं दूसरी सरकारी एजेंसियां। ऐसे में जलभराव होने पर यह तय करना भी मुश्किल हो जाता है कि कार्रवाई कौन करेगा। इन एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल न होने के कारण राहत कार्य में देरी होती है और खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है।