रणघोष की सीधी सपाट बात : समझ में नही आ रहा टिकट मांगने वाले ईमानदार है या बांटने वाले

रणघोष खास. प्रदीप हरीश नारायण

देश प्रदेश के छोटे बड़े चुनाव में टिकट एक ऐसा नाम है जिसके पीछे राजनीति सभी तरह के नृत्य करते हुए नजर आती है। किसी भी नेता या राजनीतिक दलों का असली चरित्र भी टिकट के रंगमंच पर साफ तौर से नजर आ जाता है। अब यहा सवाल उठता है की चुनाव के समय टिकट मांगने वाले नेता अपनी सोच के प्रति ईमानदार होते हैं या टिकट बांटने वाले। इस राज पर अभी तक पूरी तरह से पर्दा नही हट पाया है।

ऐसी स्थिति में टिकट नही मिलने पर जमीनी मजबूत नेता बगावती हो जाते हैं। जिस पार्टी को वह लंबे समय तक मां की तरह मानते रहे वह अचानक उसे खलनायिकता लगने लगती है। जब ये नेता आजाद उम्मीदवार या दूसरी पार्टी की टिकट पर चुनाव जीत जाते हैं तो टिकट बांटने वालों की ईमानदारी पूरी तरह से बेनकाब हो जाती है। चुनाव शुरू होने से लेकर परिणाम तक टिकट के नाम पर जो कुछ भी घटित होता है उसी में पार्टी ओर नेता का मूल चरित्र सामने आता है। टिकट के समय नेताओं की कैटेगिरी बड़ी मायने रखती है।  बड़े नेताओं में अभी तक यही सुना था की वे टिकट बांटते हैं। राजनीतिक दल उनके घर पर टिकट लेकर पहुंचते हैं और उनके आशीर्वाद से किसी नेता का भाग्योदय होता है। पिछले कुछ समय से राजनीति ने अपना मिजाज भी बदल लिया है। जिन्हें हमें बड़े नेता कहते हैं वे सबसे ज्यादा टिकटों को लेकर संघर्ष करते हुए नजर आ रहे हैं वह भी खुद के वजूद को बचाए रखने के लिए। आमतौर पर राजनीति में बड़े नेता की परिभाषा जो लंबे समय तक सत्ता में रहे और अपने प्रभाव से हार जीत का समीकरण बदलने की ताकत रखते हो वही हैसियत वाला नेता कहलाता था। इनके साथ यह धारणा भी चलती थी की इन नेताओं के क्षेत्र में जल्दी से कोई उनके रहमों करम के बिना उभर नही सकता। अगर कोई कोशिश करता है तो या तो कुछ समय बाद बिखरकर टूट जाता है या अपने मजबूत इरादों से अलग पहचान बनाने में कामयाब हो जाता है। इसलिए टिकट मांगना और देने की प्रक्रिया के दौरान जो कुछ भी घटित होता है वही राजनीति का असली चरित्र है जो हर चुनाव में मिजाज ओर माहौल के हिसाब से बदलता रहता है।