– पूर्व मंत्री कप्तान अजय सिंह परिवार पर यह सीधा हमला है लेकिन उनकी नजर में यह मसला झूठ का पुलिंदा है
– अगर यह मसला झूठा है तो अधिकारी इसकी जांच कर इसे खत्म क्यों नहीं कर रहे
– सबसे बड़ा सवाल यह आपसी राजनीति में एक दूसरे को नीचा दिखाने का खेल है तो मीडिया के प्लेटफार्म पर ही लड़ाई क्यों लड़ी जा रही है
– अभी तक जो भी परिणाम सामने आए हैं उसमें खबर छापने पर विरोधी पक्ष मीडिया पर आंखें ढेढ़ी कर लेता है नहीं छापने पर शिकायकर्ता मीडिया को बिकाऊ बता देता है।
रणघोष खास. रेवाड़ी की कलम से
13 जून को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री ओम प्रकाश यादव की कष्ट निवारण समिति की मीटिंग में हाई प्रोफाइल 367 एकड़ सरप्लस भूमि का मामला रखा जा रहा है। इस मसले पर अभी तक मीडिया प्लेटफार्म पर राजनीति होती रही है। इस मामले में पूरी तरह पूर्व मंत्री कप्तान अजय सिंह यादव के परिवार को निशाने पर लिया गया है। कई सालों से यह मसला समय के साथ बदले प्रभाव के कारण दबता- उछलता रहा है लेकिन समाधान तक नहीं पहुंचा है। वर्तमान में भाजपा सरकार होने की वजह से इस मामले में करंट नजर आने लगा है। दूसरा केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की कार्यप्रणाली पर लगातार हमला करते आ रहे पूर्व मंत्री कप्तान अजय सिंह यादव के लिए इस बार परेशानी खड़ी हो सकती है। इस मसले को देखने जा रहे राज्य मंत्री ओमप्रकाश यादव राव इंद्रजीत सिंह खेमें से आते हैं। ऐसे में जाहिर है कष्ट निवारण समिति की मीटिंग में यह मसला रूटीन में नहीं शामिल नहीं हुआ है। पिछले कुछ माह से केंद्र व राज्य सरकार भी भ्रष्टाचार को लेकर बेहद गंभीर नजर आ रही है। जहां विपक्षी सरकारें हैं या दल हैं वहां बड़े बड़े नेता जांच एजेंसियों के निशाने पर आते जा रहे हैं। ऐसे में अगर इस मामले भाजपा सरकार ने गंभीरता से लेना शुरू कर दिया हैं तो आने वाले दिनों में कप्तान अजय सिंह यादव व उनके परिवारों के लिए मुश्किलें हो सकती हैं। हालांकि इस मामले का असल सच आना बाकी है कि कप्तान परिवार के खिलाफ जुटाए गए साक्ष्यों में दम है या फिर राजनीति हथकंडों के चलते यह खेल खेला जा रहा है।
विजय सोमाणी ने मीडिया में जारी प्रेस नोट में किया है कई तरह का खुलासा
शिकायतकर्ता विजय सोमाणी का दावा है कि हरियाणा सीलिंग एक्ट के अनुसार गांव सहारणवास (गांगुली) व सूमाखेड़ा की 367 एकड़ भूमि जो कि पूर्व मंत्री कैप्टन अजय सिंह यादव के पिता पूर्व विधायक राव अभय सिंह की सर प्लस घोषित की गई थी, जिसकी मालिक हरियाणा सरकार है। हमने सरकार से गुहार लगाई थी कि इसे सरकार अपने कब्जे में ले व जमीन पर बैठे अवैध कब्जा धारियों से मुक्त कराएं। 30/12/ 2021 में तत्कालीन एसडीएम रेवाड़ी ने पत्र क्रमांक 9926- 29 व 9918-23 के माध्यम से उपरोक्त भूमि पर गैर मौरूसी के रूप में पूर्व मंत्री कैप्टन अजय सिंह यादव सहित परिवार के लगभग 10 सदस्यों को नोटिस भेजा था, जिसमें पूर्व मंत्री का विधायक बेटा चिरंजीव राव व भतीजा तहसीलदार रणविजय सिंह प्रमुख रूप से शामिल है। उपमंडल अधिकारी ने तहसीलदार रेवाड़ी को मय रिकॉर्ड तलब किया था। सोमाणी का यह भी दावा है कि हरियाणा के गुप्तचर विभाग ने भी एसपी रेवाड़ी को अपनी गुप्त जांच में बताया था कि सहारणवास की भूमि पर पूर्व मंत्री कैप्टन अजय सिंह का भतीजा तहसीलदार रणविजय, भाई अनिल राव, बेटा विधायक चिरंजीव राव व भतीजा अभिमन्यु राव काबिज है मगर राजस्व रिकार्ड में जमीन की मलकियत हरियाणा सरकार के नाम चली आ रही है। एसडीम सिद्धार्थ दहिया की कोर्ट ने 31 मार्च 2022 को इस मामले पर संज्ञान लेते हुए प्रथम चरण में सहारणवास ( गांगोली ) की 21 एकड़ 2 कनाल 4 मरला व सूमाखेड़ा की 2 एकड़ 4 कनाल 9 मरला जमीन को तहसीलदार रेवाड़ी व पाल्हावास को आदेश दिए कि दोनों अधिकारी दोनों गांव की कुल 24 एकड़ जमीन पर कब्जा ले। मगर अभी तक जमीनी स्तर पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है। सोमाणी ने बताया कि सहारणवास में 111 एकड़ 3 कनाल 3 मरला व सूमाखेड़ा में 233 एकड़ 3 कनाल 9 मरला जमीन पर कब्जा लेना बाकी है। 367 किसान संघर्ष समिति ने ग्रीवेंस कमेटी के चेयरमैन ओमप्रकाश यादव सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री से 15 मई को फिर गुहार लगाई थी कि बाकी की 343 एकड़ जमीन भी पूर्व मंत्री व उसके परिवार से छुड़वाई जाएं। 41 वर्षों से अवैध कब्जा धारियों से फायदा उठाने की रिकवरी भी की जाए व जिन 11 भूमिहीन व्यक्तियों ने उपरोक्त जमीन अलाट करने का प्रार्थना पत्र दिया है उन्हें अलाट की जाए।
कप्तान परिवार से संपर्क किया कोई जवाब नहीं
इस बारे में पूर्व मंत्री कप्तान अजय सिंह यादव परिवार के सदस्य से संपर्क किया लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया। कुछ समय पहले कप्तान ने इस मामले में उनके परिवार की छवि खराब करने का आरोप लगाते हुए मानहानि का केस करने की चेतावनी जरूरी दी थी। उन्होंने यहां तक कहा था कि आरोप लगाने वाले इतनी हैसियत नहीं है कि इसके लिए उन्हें सफाई देनाी पड़े।
इस मामले में मीडिया का अभी तक इस्तेमाल होता रहा है
कायदे से इस मामले में देखा जाए तो मीडिया इस्तेमाल ही होता रहा है। अगर शिकायकर्ता की तरफ से जारी प्रेस नोट को प्रकाशित नहीं करते हैं तो उस पर दबाव व कमजोर होने के आरोप लगते हैं। खबर प्रकाशन पर दूसरा पक्ष अपनी नजरें टेढ़ी कर लेता है। प्रशासन अभी तक कागजी कार्रवाई में ही लगा रहता है। क्षेत्र के बड़े नेता चुपचाप बैठकर नजारा देख रहे हैं। राजनीति में नेता कब एक दूसरे के दुश्मन बनकर दोस्त हो जाए। कुछ पता नहीं चलता। कुल मिलाकर इस पूरे खेल में मीडिया इस तरह के मामलों में चौथे लोकतंत्र के नाम पर इन नेताओं के द्वारा एक दूसरे को बदनाम करने के खेल का जरिया भी बन जाता है।