होई जबै द्वै तनहुँ इक
असमाप्य कहानी ( अध्याय 32)
उस गहन अंधेरे में पैरों से धरती को टटोलता हुआ मैं अपने फ्लैट तक पहुँचा। मुझे नहीं पता वह मुझे देख पा रहा था या नहीं। मैंने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा।
दरवाज़ा खटखटाया तो देर तक कोई आवाज़ नहीं आई। विमला शायद मोमबत्ती जलाने के लिए माचिस ढूँढ़ रही थी, अपने छोटे से मंदिर की ड्रावर में। मैंने बार बार दरवाज़ा खटखटाना ठीक नहीं समझा, और ना ही आवाज़ लगाना। मैं इस अंधेरे में कहीं भी अपनी उपस्थिति का चिह्न नहीं छोड़ना चाहता था।
मुंबई में बहुत कम बिजली जाती है, और ऐसा तो कभी नहीं होता कि पूरा शहर अंधेरे में समा जाए। यहां लोग इन्वर्टर भी नहीं रखते। बिजली आने का इंतज़ार करते हैं। थोड़ी देर में दरवाज़े की झिर्री से हल्की सी रोशनी दिखाई दी, और फिर बिमला के कदमों की आहट हुई।
” ऐसे छुपे क्या खड़े हो, अंधेरे में। ना आवाज़ दी और ना दोबारा दरवाज़ा खटखटाया।”
मैं चुप रहा, और दरवाज़ा खुलते ही अंदर जाकर चटकनी लगा दी।
” कई दिन हो गए, पता नहीं, खोए खोए से रहते हो। कुछ तो है, किसी से अनबन चल रही है, या फिर कहीं पैसे फँसा बैठे हो।”
मेरे भड़कने के लिए यह काफी था, पर मैं शांत रहा।
“खाना डाल दूँ?”
“नहीं मैं खाना नहीं खाऊँगा, भूख नहीं है। मैं आज यहीं ड्रॉइंगरूम में सो जाऊँगा, देर रात तक कुछ काम करना है।”
” क्या काम करोगे, अंधेरे में?”
” बिजली हमेशा के लिए तो नहीं गई है ना?”
और वह अंदर चली गई। मैं कपड़े बदल कर लेट गया।
मैं उसके बारे में नहीं सोचना चाहता था। मगर कुछ नहीं सोचते हुए भी लगा वह मेरे दिमाग में बैठा है, अकेला। मैं नहीं हूँ उसके सामने, बस एक खाली बेंच है। थक कर मेरी आँखें बंद हो रही हैं। आशंका मुझे जगाए हुए है। समय पल पल चल रहा है। शब्द धुंधले हो गए हैं। बाहर और भीतर का अंधेरा एकसार हो रहा है।
मुझे दरवाज़े की घंटी सुनाई दी, और मैं उचक कर उठा। डरता हुआ, कहीं विमला उठ कर नहीं आ जाए। अंधेरा अब इतना सघन नहीं था। मैंने बिना कोई खटर पटर किए बड़ी सावधानी से दरवाजा खोला। मेरा भय मेरे सामने था।
मैंने धीरे से कहा, ” मगर तुमने घंटी कैसे बजाई? ”
वह मुस्कुराता हुआ धीरे धीरे खड़ा हुआ।
मैं कांपते हुए फुसफुसाया, ” तो तुम अपाहिज नहीं हो?”
उसने अचानक एक किवाड़ को धकेला, अंदर आया, और झट से दरवाज़ा बंद कर दिया। मुझे धकेल कर दीवान पर बिठा दिया, और कंधे पर हाथ रख कर मेरे साथ बैठ गया।
” मेरी बात गौर से सुनो। मैंने कहा था ना, यह कहानी तुम्हें पूरी सुनना होगा, और मेरे पैसे भी देने ही होंगे। आज 31 दिन हो गए, हिसाब लगा लो। अच्छा फ्लैट है, बेच दो इसे और अपने गांव चले जाओ। नहीं तो..”
” नहीं तो?”
वह हँसा। ” पहले कहानी पूरी सुन लो। उसके बाद बताता हूँ।”
मैंने उसे धकेल कर थोड़ा सरकाया।
” मैं देख रहा था ख़ून में लथपथ उन दोनों के शव। उनके शरीर पर थी हजारों योनियां और उन सबसे रिस रहा था ख़ून। इतने में बावरी की आवाज़ आई — ‘ म्हें थारी बाट देखां भंवर जी। जल्दी आज्यो।’
मैं बहुत देर तक वहां बैठा रहा। मेरे इस धरती रहने का अब कोई अर्थ नहीं बचा था। मैं उठा, और मैंने उसी दरांती से अपने शरीर को चीर दिया। मैं भी तो बावरी का अपराधी था। मगर मैं मर कर भी उसके पास नहीं जा सका। मैं यहीं था। मर कर भी विलुप्त नहीं हुआ था। तुम जानते हो। और अब मैं यहीं रहूँगा, तुम्हारे साथ, विमला के साथ। अगर तुम ने यह घर बेच कर मेरा हिसाब चुकता नहीं किया तो।”
सुन कर मैंने आपा खो दिया।
मैं चिल्लाने लगा, ” बाहर निकल जाओ। इसी समय बाहर निकल जाओ। और मैं उस पर झपटा। पूरी कोशिश के बाद भी मेरे हाथ पैर नहीं चल रहे थे। मैं चिल्लाए जा रहा था। वह खड़ा खड़ा हँस रहा था। “विमला जग गई है, तुम्हारा चिल्लाने से। मैं जा रहा हूँ। मगर मुझे ढूँढते हुए तुम फिर आओगे। कभी समाप्त नहीं होती, कहानी असमाप्य है।”
” कौन है, किस पर चिल्ला रहे हो इतनी ज़ोर से।” विमला ने कंधा पकड़ कर ज़ोर से मुझे हिलाया। मेरी आँख खुली तो मैं हाँफ रहा था।
मैंने विमला का हाथ पकड़ा। ” नहीं, कुछ नहीं है। घबराने की कोई बात नहीं है। सपना था।”
“उठ कर मुँह धो लो। सुबह होने वाली है। यह तो नहीं जल्दी सो जाएं और सुबह एक बार बाहर हवा में घूम आएं।”
वह अंदर चली गई, और मैं कई देर बिस्तर में पड़ा रहा। कुछ नहीं सोच रहा था, बस मूक चित्र चल रहे थे मेरी आँखों के सामने। मैं धीरे से मुस्कुराया। अंदर गया और विमला की कमर पर हाथ रखा। वह खिड़की के शीशे साफ कर रही थी।
” तुम बेवजह परेशान हो रही हो, कुछ भी नहीं हुआ है।”
विमला कुछ नहीं बोली, मेरा हाथ झटक दिया। उसकी आदत है।
मैं दिन भर बहाने ढूँढ कर उसकी मनुहार करता रहा, उसे आश्वस्त करने के लिए। शाम की चाय पीने बैठे तो मैंने बात छेड़ी।
” तुम्हें लगता नहीं, हमें गाँव जाकर रहना चाहिए। देखो ना, हम हमेशा उन दिनों की बातें करते हैं, जो हमने गाँव में जिए, और रहते यहां है, इस शहर में जो इतने साल रह कर भी हमारा नहीं हुआ।”
उसने नज़र उठा कर मुझे देखा। एक पहनी हुई मुस्कुराहट थी उसके चेहरे पर।
“और इस घर को बेच देना चाहिए। गाँव के घर को अच्छे से बना लेते हैं। नहीं?”
फिर मेरी तरफ देखा।
” तीन चार बीघा ज़मीन है, उसमें खेती करेंगे। ऑर्गेनिक? दो गाय रख लेंगे? मैं काम में लगी रहूँगी, और आप छत पर बैठ कर कहानियां लिखोगे? कितनी अच्छी जिंदगी होगी?”
मैं जानता था उसके कहने में कितना तंज है और कितना विनोद।
मैं विमला के नजदीक सरका। “कुछ और भी। याद है जब तुम नई नई आई थी, हम छत पर बैठ कर ढलता सूरज देखते थे। और रात देर तक चांदनी में नहाते थे। वह तारों से झिलमिल आसमान, और तन्हा चलता जाता चांद।” मैंने उसे बाहों में भर लिया, और धीरे से कान में फुसफुसाया, ” चलो, वही जिंदगी जीते हैं, एक बार फिर।”
उसने धीरे धीरे मेरे बाहुपाश को तोड़ा। ” बस बस, मैं खूब जानती हूँ आपको। जो कहना है थोड़ी दूर से कहो। और जो बीत जाता है वह लौट कर नहीं आता, यादों में बस जाता है।”
मुझ से दूर हटकर मुस्कुराई। “आज खीर चूरमा बना रही हूँ। और भी बहुत कुछ है याद करने के लिए।” आँखों में आत्मीयता झलक रही थी। ” हां, अबकी बार शिव रात्रि पर जरूर चलूँगी। मुझे भी देखना है बाघोत का मेला। बहुत सुना है। और वह जो तुम बताया करते हो, सांसरणी की मढ़ी।”
उस दिन शाम को मैं उसी गार्डन में फिर गया,और उसी बेंच पर जाकर बैठ गया। मेरी कहानी पूरी हो गई थी।
इतने में एक परिचित आया, जिसे मैं कई सालों से देखता हूं, पहचानता हूँ, पर नाम नहीं पता।
” आजकल इसी बेंच पर आकर बैठते हो, कई बार देखा है।
” हां, एक मिल गया था, उसे यहीं बैठ कर बात करना पसंद था।”
” मगर हमने जब भी देखा अकेले बैठे देखा है आपको।”
हम दोनों की निगाह मिली, और कुछ पल तक मिली रही।
