इलाज के नाम पर हजारों लोग कर्जदार हो गए, डॉक्टर्स मालामाल, हर महीने खुल रहा एक नया अस्पताल

हैरानी की बात यह है कि शहर में एक भी डॉक्टर्स ऐसा नहीं है जो पूरी तरह से स्वस्थ्य हो


रणघोष खास. सुभाष चौधरी


रेवाड़ी शहर चारों तरफ से अस्पतालों की इमारतों से घिरता जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि यहां के लोग तेजी से मानसिक- शारीरिक तौर पर बीमार- कमजोर एवं डिप्रेशन की चपेट में आ रहे है। अगर यह सच नहीं है तो हर महीने एक नया अस्पताल इस जमीन पर जन्म क्यों ले रहा है। शहर की 6 किमी की सीमा में खुल चुके 150 से ज्यादा छोटे बड़े अस्पताल क्या साबित कर रहे हैं। अस्पताल खोलने वालों में  ऐसे डॉक्टरों की संख्या ज्यादा है जो पहले किसी अस्पताल में नौकरी करते हैं। उसके कुछ साल बाद यहीं  डॉक्टर्स कई करोड़ों की संपत्ति के मालिक बनकर अपना अलग से नया अस्पताल खोल डालते हैं।

प्रोपर्टी डीलर्स एवं बिल्डरों की माने तो शहर के अंदर व बाहर सबसे ज्यादा जमीनें ही डॉक्टर्स खरीद रहे हैं। लोकेशन पर जमीन खरीदने के लिए डॉक्टर्स मनमानी कीमत तक देने को तैयार है। इसलिए जमीनों के रेट आसमान को छू रहे हैं। शहर के सरकुलर रोड पर लगने वाले जाम की वजह भी अस्पतालों के बाहर खड़े वाहनों को माना गया है। अस्पताल बनाते समय टैक्स के नाम पर नगर परिषद के खाते में इतनी राशि जमा नहीं होती जितनी अधिकारी, नप पार्षद एवं कर्मचारियों की जेब में फाइल पास कराने पर पहुंच जाती है। इसलिए अस्पताल की इमारतें नियमों को ताक पर रखकर रातों रात बनकर तैयार भी हो जाती है। यह खेल बड़ा होता है इसलिए नेता एवं अधिकारी भी हस्तक्षेप करने में पीछे हट जाते हैं। इसके अलावा कुछ अस्पताल किराए की इमारतों में खुले हुए हैं जिसका किराया ही कई लाखों रुपए प्रति माह है। सोचिए अस्पताल इन तमाम खर्चों को वहन करने के लिए किस कदर मरीजों के परिजनों से वसूली का नंगा नाच करता है। 90 प्रतिशत मरीजों के परिजनों को यह नहीं पता चलता कि इलाज के नाम पर डॉक्टर्स इतना भारी भरकम बिल कैसे बना देते हैं। अस्पताल में खुले मेडिकल स्टोर किस दवा के कितनी राशि वसूल रहे हैं। स्टाफ मरीजों को दवाईं दे रहा है या नहीं। किसी को कुछ पता नहीं होता। परिजन बस हाथ जोड़े मरीज के स्व्स्थ्य होने की कामना करते है। अस्पताल में राउंड पर आने वाले डॉक्टरों का स्टाइल इतना प्रभावशाली होता है उसके आस पास पांच- दस कर्मचारियों की फौज साथ चलती है। वे राष्ट्रपति- प्रधानमंत्री के प्रभावशाली अंदाज मे आएंगे। मरीज व परिजनों को पता नहीं चलेगा  कि क्या करें क्या नहीं करें।  आईएमए के कुछ डॉक्टरों से हुई बातचीत के मुताबिक शहर में स्थापित अस्पतालों का ही हर माह 200 से 300 करोड़ से ज्यादा का बिजनेस मरीजों के इलाज के नाम पर होता है। हालात यह हो चुके हैं कि मरीजों को अपने विश्वास में लेने के लिए डॉक्टर्स किसी हद तक अपने पेशे की गरिमा को गिराने के लिए तैयार हे। इसलिए मरीजों की छीना झपटी के लिए डॉक्टर्स अखबारों में विज्ञापन में इलाज का रेट व स्कीम एवं छूट तक का जिक्र कर रहे हैं। कुछ अस्पतालों ने तो पैनल के नाम पर हरियाणा सरकार के लोगो का इस कदर इस्तेमाल करना  शुरू कर दिया है मानो इस अस्पताल को ही सरकार ने गोद लिया हुआ है। सबकुछ खुलेआम एवं डंके की चोट पर हो रहा है। कार्रवाई इसलिए नहीं होगी क्योंकि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी एवं कर्मचारियों को भी इन अस्पतालों से अच्छी खासी खुराक मिल रही है। इसलिए इनका हाजमा ठीक रहता है। अगर यह सच नहीं है तो कोविड- 19 के कहर में अपनी जिंदगी गंवाने वालों का सच आज तक राज नहीं रहता।

 एक भी डॉक्टर्स नहीं है जो पूरी तरह से स्वस्थ्य हो

हैरान करने वाली बात यह है कि शहर में जितने भी अस्पताल में डॉक्टर्स अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उसमें एक भी डॉक्टर्स ऐसा नहीं है जो मानसिक एवं शारीरिक तौर पर पूरी तरह से स्वस्थ्य हो। इसलिए आईएमए के पास भी ऐसा रिकार्ड नहीं है जिसमें किसी डॉक्टर्स ने 90-100 के दरम्यान की उम्र पार की हो। इससे उलट गांवों में आज भी कोई ना कोई बुजुर्ग 100 साल पार मिल जाएगा। 80 से 90 साल वालों में तो अधिकांश गांव की चौपाल पर हुक्का एवं ताश खेलते नजर आते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में मौजूदा हालात में डॉक्टर्स पेशा अपनी गरिमा को बचाते हुए घरती के भगवान का दर्जा हासिल करने के गौरव का बचा पा रहा है।