होई जबै द्वै तनहुँ इक
कालसेतु ( अध्याय 27)
“खाट री ओट कर द्यो।” बावरी की आवाज़ आई।
कह कर उसने पलकें नीची कर ली।
वैसे तो पलकों की ओट से बड़ी कोई ओट नहीं होती है। मुझे बावरी की कही बात याद आ रही थी- “पति क्या भंवर जी, ईस्वर ताहीं बी परदो तो होणो ही चाइये। दादी कही करी, ईस्वर बी तो मरद ही हुयो ना।”
मैंने एक कोने में खाट आड़ी कर दी। उस पर एक चादर डाल दी। और पानी की बाल्टी भर कर रख दी।
” संदूकड़ी माहीं म्हारो ब्याह को जोड़ो धरयो सै। निकाल के इहाँ खाट पर धर द्यो। म्हें न्हाय कै लत्ता बदळां, थे नई दूब ल्याओ।”
मां के ब्याह का जोड़ा, जो बावरी ने हमारे बोल ब्याह में पहना था, जैसे ही मैंने अपने दोनों हाथों से उठाया, भावनाओं का एक ग्लेशियर सा मेरे भीतर दरका। मैं इस समय बहना नहीं चाहता था। यह पहाड़ की तरह स्थिर रहने का समय था। मैंने जोड़े को आड़ी खड़ी खाट पर लटकाया और नीची नज़रें किये बाहर निकल गया।
दरवाज़े पर पहुँच कर मैंने कनखियों से उसकी ओर देखा। बावरी मृत सी खाट पर पड़ी थी। उसके चेहरे पर पीड़ा का भाव आया, और हल्की सी मुस्कुराहट के साथ बह कर चला गया। मैं बेचैन हो गया। मैंने अपने निर्णय को मन ही मन दोहराया- आज मुझे बावरी को इस दशा से छुटकारा दिलाना ही होगा।
मैंने बाहर से झाँक कर देखा। वह मेरे बाहर निकलते ही दर्द से छटपटाने लगी थी। मुझे लगा, अपनी पीड़ा से दो चार होने के लिए ही उसने मुझे बाहर भेजा है। खड़ा होना तो क्या, बैठने की हालत में भी नहीं है तो फिर खुद स्नान करके कपड़े कैसे पहनेगी। मेरा धैर्य टूट रहा था। प्रबोधिनी एकादशी जा चुकी थी। कार्तिक पूर्णिमा तीन दिन बाद आएगी। बस यही एक मौका था, मैं उन दोनों तक पहुँच सकता हूँ। कुछ भी हो कार्तिक पूर्णिमा को वे दोनों ब्रह्माजी के मंदिर ज़रूर पहुंचेंगे। मुझे पुष्कर जाना ही होगा।”
उसने नज़र उठा कर मेरी ओर देखा।
” पुष्कर तो गये ही होगे तुम?”
मैं चुप रहा। मैंने अपने चेहरे पर सायास एक भावशून्यता बना कर रखी ताकि उसे कोई अंदाज़ा नहीं लगे। वह मुझे ऐसे देख रहा था, जैसे मैं एक बच्चा हूँ। कुछ भी नहीं बताने की ज़िद करके बैठा बच्चा। मेरा भय मुझे जकड़ता जा रहा था।
वह अपनी मुस्कराहट समेट कर फिर शुरू हुआ।
” मैंने बेमन से दूब के कुछ तार फाड़े। बावरी की यह असमय की गणगौर मुझे अचानक बच्चों का खेल सा लगा। मैं वास्तविकता का वास्तविकता की तरह सामना करना चाहता था। इस अलौकिकता की भावदशा से बाहर निकल कर। मुझे, एक नहीं, चार हत्यायें करनी थी।”
वह बोलता जा रहा था, और मैं उसके चेहरे को घूर रहा था। मुझे पहली बार लगा, मैं इसे जानता हूँ और यह मुझे जानता है। अब हमारा यह खेल ज़्यादा दिन नहीं चल पायेगा। यह मेरा आखिरी दिन है। मैं कल से नहीं आऊँगा।
” बावरी की मौत की कहानी सुनकर तुम समझ रहे हो, तुम्हारी जिज्ञासा शान्त हो जायेगी। और अगर यह सोच रहे हो उससे आगे की कहानी सुने बिना, और रकम चुकाए बिना तुम छुटकारा पा लोगे तो यह तुम्हारा भरम है। तुम मेरी गिरफ्त में फंस चुके हो।”
मैंने साहस करके उससे आँखें मिलाई। उसकी मुस्कान में विजयी होने का कुटिल भाव था। और उस मुस्कान के तले रोष था, ज्वालामुखी की तरह फटने के लिए आतुर।
” अब मैं बीच में विघ्न नहीं चाहता। पूर्णाहुति के पल तक। कार्तिक पूर्णिमा को ब्रह्मा ने अपने यज्ञ की पूर्णाहुति दी थी।”
एक मौन हम दोनों के बीच पसर गया। यह मौन एक पुल की तरह था। जिस पर मैं उस तक जा सकता था, और वह मुझ तक आ सकता था। ईंट और सीमेंट से नहीं; शब्द शब्द, और पल पल से बना हुआ पुल…कालसेतु। मैं भयभीत भी था, और रोमांचित भी।
क्रमश: जारी..
