होई जबै द्वै तनहुँ इक
प्रथम रात्रि : देव रात्रि ( अध्याय 15)
देवलोक में अपना स्वागत देख कर ईसर चकित थे। इंद्र ने उनकी सोच को मानव हित के लिए कल्याणकारी और देवत्व के लिए अनुपम उदाहरण बताया। उनके साहस की भूरि भूरि प्रशंसा की। उन्हें महादेव का योग्यपुत्र बता कर अपने साथ अपने सिंहासन पर बिठाया। ईसर को ग्लानि हुई कि उसकी सोच इंद्र को लेकर कितनी संकुचित थी। भोले महादेव के भोले पुत्र देवताओं की बुद्धिमयता से पूरी तरह परिचित नहीं थे। विदा करते समय मरुधरा की सौम्य साधारण कन्या से विवाह की अनुमति ही नहीं, स्वयं विवाह में उपस्थित रहने का आश्वासन दिया। ईसर देवताओं का आशीर्वाद पाकर प्रफुल्लित थे।
बस शेष था तो गौरा के गाँव पहुँच उसके पिता की अनुमति लेना। गौरा को उस निर्जन सी बनी में ढूँढना जितना दूभर था उतना ही आनंदमय। उन्हें तो गौरा को खोजने का यह खेल बहुत भाया। गौरा के सुमधुर गीतों और मादक गंध को फिर से जी भर कर आत्मसात किया।
गौरा ने पहुँचते ही ईसर को अपने पिता के पास जाने का रास्ता बताया। कंटीली बनी में इकलौते पीपल के पास की कुटिया में जैसे ही ईसर ने प्रवेश किया तो अचंभित थे। वहाँ तो कोई भी नहीं था। इतने में गौरा आती दिखी।
“क्या कहा मेरे पिता ने?”
“कौन पिता, यहाँ तो कोई भी नहीं है?”
गौरा को हँसी आ गयी। “कुटिया के बाहर जो यह पत्थर खड़ा है यह मेरा पिता है, और जो सिल रखी है यह मेरी माता है। मैं सब कुछ इन्हीं से पूछकर करती हूँ।”
ईसर ने बिना कोई प्रश्न किए। द्वार पर रखे पत्थर से अनुमति माँगी।
गौरा ने तुरंत हाँ कर दी। “मैं तुमसे विवाह करने के लिए राज़ी हूँ , आगंतुक। तुम सचमुच मुझ से प्रेम करते हो। कोई भी पुरुष तुम्हारी जगह होता तो, इस पत्थर के मेरे पिता होने को लेकर प्रश्न करता। मैं नहीं जानती मेरे माता पिता कौन हैं… वे जो भी थे, आज इस धरती में हैं। इसलिए यही मेरी माता है और यही पिता। पर आज मुझे मेरा जीवनसंगी मिल गया।”
ईसर और गौरा का विवाह विधि-पूर्वक हुआ। गौरा की ओर से बनी के आस पास रह रहे दस बीस लोग-लुगाई आये। ईसर की ओर से देवलोक से अनेक देवता और स्वयं इंद्र आये। विवाह संपन्न होने पर ईसर ने सबको आभार जता कर विदा किया। अंतत: वे इंद्र के पास पहुँचे।
“देवराज मैं आपका हृदय से आभारी हूँ। आप आए और हम दोनों को आशीर्वाद दिया। आप भी अपने देवलोक प्रस्थान कीजिए।”
ईसर का भोला चेहरा देख कर इंद्र मुस्कुराते रहे। फिर बोले- “हम कहाँ जाएँगे ईसर देव!”
ईसर बोले, “मैं कुछ समझा नहीं देवराज इंद्र। आप यहाँ इस निर्जन वन में रात्रि भर कैसे ठहरेंगे?”
इंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा– “अपने पिता की तरह भोले भी बहुत हो ईसर देव। मृत्यलोक की परंपरा भी नहीं जानते। प्रथम रात्रि… देव रात्रि! पहली रात देवताओं की रात होती है यहाँ।”
मैं अचानक बोल उठा, ” ठहरो!”
मेरे स्मृति पटल पर उस रात का दृश्य उभर आया।
बारात लौट आई थी। ताऊ जी ने ऐसे ही कहा था– ‘कल सुबह तो लड़के और बहू को देव पूजने जाना होगा।’ यह ऐसे ही नहीं था। याद दिलाने के लिए था। भाभी ने जब कहा, “लाला जी का पलंग बिछा दूं चौबारे पर?” तो ताई जी ने झिड़क कर कहा था, “जा बे सांसरणी, रीति रिवाज भी नहीं जानती। आज देवताओं की रात है। कल देव पूजने के बाद।”
‘ओ माइ गॉड !” मेरा मुँह खुला रह गया।
उसने टोका, ” कुछ याद आ गया क्या ?” फिर वह भी अपनी यादें समेटता हुआ बोला,”मुझे भी याद है वह रात। मैं नास्तिक हूँ। बावरी देवताओं को मानती थी। पर अपनी पवित्रता से ऊपर नहीं। हम पहली रात ही एक दूसरे में समा गये थे।”
यह कह कर कहानी पर लौट आया, ” मगर ईसर को अभी भी बात समझ में नहीं आई थी। इंद्र ने खुलासा किया– ‘ देखो ईसर देव, आज तुम कुटिया के बाहर सोवोगे, हम अंदर। आज रात के लिए यह सुकुमारी कन्या हमारी है।”
ईसर जानते भी नहीं थे कि क्रोध क्या होता है। पर इतना सुनते ही उनकी आँखों से खून बरसने लगा। चीख कर बोले। “देवराज इंद्र, तुम इसी समय मेरी दृष्टि से दूर हो जाओ, नहीं तो मैं तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दूँगा। तुम्हारे देवलोक को जला कर राख कर दूँगा।”
ईसर ने अपने जीवन में वह दुख बुला लिया था, जो केवल ब्रह्मा जानते थे। ईसर और गौरा को कभी इस पर पश्चाताप नहीं हुआ। बल्कि उनका प्रेम और भी प्रगाढ़ हो गया था। मगर जीवन अग्नि का कुंड है।
क्रमश: जारी..
