बोल ब्याह (अध्याय 4)
आज वह पहले से ही मौजूद था।
मेरे पहुँचते ही शुरू हो गया। “कभी दिल्ली से जयपुर गये हो?”
उसके प्रश्न को मैंने अनसुना किया, और ज़ोर देकर कहा- “बोल ब्याह!”
वह हँसा। “वही बता रहा हूँ… लगता है पैसे हाथ से निकलते देख बहुत परेशान हो। मैंने तुम्हें बताया ज़िंदगी पाँच और पचास का खेल नहीं है। छोटी सी गिनती के लिए नहीं आए हो यहाँ।”
मैं खीझ कर बोला, “काम की बात!”
उसने हाथ आगे बढ़ा कर कहा, “काम की बात ?… लाओ।”
दो सौ रुपये मुट्ठी में भर कर उसने ऊपर की जेब में ठूँस लिये।
वह पता नहीं कब मेरे पीछे कोठरी में आयी, और आते ही अंदर से सांकल लगा दी। सूरज अभी एक लाठी था, पर किवाड़ ढलते ही घुप अंधेरा हो गया। उसने फट से माचिस निकाल कर सुलगाई। मैं समझा चिमनी जलाएगी। पर जलती तिल्ली हाथ में पकड़, वह दाँत भींच कर बोली, “हाथ लगान री कोसिस बी करी, तो ऐंया खड़ी जल के राख हो जांसी।”
एक बार तो मैं सहम गया। पर फिर हँस कर बोला, “अरे, मैं तो तुम्हें वैसे ही हाथ नहीं लगाने वाला हूँ। बस बात करूँगा। आओ यहाँ बैठो।” मैंने दूसरी तरफ खड़ा होकर उसे पलंग पर बैठने को कहा। वह शंका भरी नज़र से मुझे घूरती रही। फिर अचानक बच्चे की तरह रोने लगी। मेरे कई बार कहने पर मुँह पोंछ कर बैठ गयी।
मैंने कहा, “बोलो, क्या कहना है तुम्हें ?”
“काई ना, बस हात नाहीं भिडाबो थे, नाय तो… ”
जो बाद में उसने मुझे बताया, मैं तुम्हें हिन्दी में बताता हूँ।”
इसे लगा मैं राजस्थानी ठीक से नहीं समझ पाऊँगा।
उसने कहा मैं बस एक आदमी के रंग में रची हुई हूँ। बस वही मुझे हाथ लगाएगा। मैंने उसकी सूरत नहीं देखी है। वह जो मुझे ब्याह कर ले जाएगा। मेरा बापू जो चाहे सो कर ले, कोई मर्द पैदा नहीं हुआ जो मुझ से ब्याह किए बिना मुझे हाथ लगा दे। शाप ले के जन्मी हूँ, पर पाप नहीं लूँगी। मेरी काया के भीतर पवित्र प्यार का बीज है, वह पेड़ बनेगा एक दिन। उसकी छाया में जीऊँगी, और वहीं मरूँगी। मेरी दादी कहा करती, हम सांसर औरतों को शाप है, और वह तब उतरेगा जब कोई सांसरणी एक मर्द की होकर मरेगी। तब से बस मैं उसी एक का सपना देख रही हूँ। मेरे मन में बेहिसाब प्यार है उस अनजाने के लिए। मुझे अपवित्र करने की कोशिश मत करो। मैं तुम्हारा लाख एहसान मानूँगी।
मुझे लगा मैं जिस प्यार के मोती को मैं खोज रहा हूँ वह मिल गया है मुझे।
मेरे मुँह से निकल गया, “मैं तुम से ब्याह करूँगा बावरी!” मैंने उसका नाम नहीं पूछा था तब तक। बावरी लगी वह मुझे। एक अपरिचित के प्रेम में बावरी।
मैंने कहा मैं अभी तुम्हारे बापू से बात करता हूँ। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। वह डरते डरते बोली, क्या सोचते हो मेरा बापू मान जाएगा। वह जब तक मुझ से बीस पचीस हज़ार नहीं कमा लेगा, मेरा ब्याह नहीं करेगा। मैं बोला, मैं दूँगा जो भी पैसे वह माँगेगा, तुम फ़िक्र मत करो।
इतने में ज़ोर ज़ोर से बाहर से सांकल खटकने की आवाज़ आयी। वह बोलती रह गयी; अभी मत खोलो, रूको। पर मैंने जोश में किवाड़ खोल दिये।
दस बारह लोग बाहर खड़े थे। उन्होंने मुझे दबोच लिया और बावरी को पकड़ कर एक तरफ ले गये।
बावरी चिल्लाती रही, “आबो थे ज़रूर आबो। मैं सारी जिनगी थारी पूजा करबो।”
वे मुझे गाली गलोच करके बस्ती के बाहर छोड़ गये। बोले, जान बख़्श दी आज तो, दोबारा इधर मुँह मत करना। इतनी देर तक जब झगड़ने की आवाज़ नहीं आई तो उनको लगा था, मैंने उनकी छोरी को फुसला लिया है और भगा कर ले जाने की प्लान बना रहा हूँ। मेरी बात कहने का मौका ही नहीं दिया सालों ने।
मैं गिरता पड़ता अपने गाँव पहुँचा। दो दिन में खड़ी फसल के साथ दो किल्ले थे, दोनों बेच दिये। तीस हज़ार मिले। मुझे बावरी के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था।
क्रमश: जारी…..
