होई जबै द्वै तनहुँ इक
कहानी कृत्य है, और कर्ता भी (अध्याय 28)
” मैं लौटा तो बावरी मृतप्राय पड़ी थी, खाट पर। पीड़ा ने जैसे उसमें से जीवन निचोड़ लिया है। मैं खाट की बाही पर बैठ कर उसे देख रहा था। उसकी आँखें बंद थी।… वह क्षण जिसका तुम अब इंतज़ार कर रहे हो…. मेरा मतलब है जो तुम सुनने के लिए आतुर हो…उस दिन इसी तरह मेरी तरफ सरकता आ रहा था।
मृत्यु को समझने के लिए मुझे तुम्हें कुछ और भी बताना है।
जो ब्रह्माण्ड हमें बाहर दिखाई देता है, वह हमारे भीतर भी है। हमारे सिर में। उस ब्रह्माण्ड में कोई जन्मता या मरता नहीं है। वह उद्भव और विलोप का संसार है। विलोप मृत्यु नहीं है। मृत्यु प्राप्त की होती है। उस संसार में सब कुछ अनुभूत है, प्राप्त कुछ भी नहीं है। जैसे तुम जानते हो, तुम्हारे परदादा भी एक दिन मर गए थे, पर तुमने ना उन्हें जीवित देखा ना मृत। तुम्हारे लिए तुम्हारे परदादा मृत नहीं हैं, विलुप्त हैं। उन्हें खोने का भाव तुम्हारे मन में पैदा ही नहीं होता, और तुम कभी उनकी मृत्यु पर विलाप नहीं कर पाओगे। वह तुम्हें प्राप्त नहीं हुए, तो तुम्हारे लिए कभी मृत भी नहीं होंगे। बस तुम्हारी कल्पना में उद्भूत होते हैं, और विलुप्त हो जाते हैं।
यह मैं उस समय नहीं जानता था, इसकी अनुभूति मुझे बाद में हुई। उस समय तो मैं प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहा था। अपना सब कुछ नष्ट करके उन दोनों अधमियों को सहस्र मौतों की मौत देना चाहता था। यह मेरा प्रारब्ध है, मेरे होने का उद्देश्य है, यह भी नहीं पता था मुझे।”
मैं उसकी इस दार्शनिकता पर न्यौछावर नहीं था। हाँ, इतना ज़रूर था कि कालसेतु के दो सिरों पर खड़े हम दोनों के सिरों में एक ही तरह के भाव गुंजायमान थे। पहली बार मुझे हम दोनों में भावात्मक एकरसता का एहसास हुआ। इतने में उसने स्वर बदल अचानक कहा- ” मैंने तकिया उठाया।” उसके हाथों की नसें तन गई। ऑंखें इतनी लाल हो गई कि आँखों में उतरे आँसू रक्त की बूंदों से लग रहे थे।
” मैंने तकिया बावरी के चेहरे पर रख दिया। अपना चेहरा घुमा लिया और पूरी ताकत से दबाता रहा। उसके कृश शरीर की छटपटाहट से खाट धीरे धीरे हिल रही थी।” इसने भी अपना चेहरा घुमा रखा था। मैं केवल उसकी हल्की चीत्कार सुन रह था। थोड़ी देर बाद उसने मेरी तरफ मुड़कर देखा। उसकी आँखें बंद थी। उनसे रक्त रिस रहा था।
वह दबी हुई आवाज़ में बोला, “थोड़ी देर में सब कुछ शांत हो गया। मैंने मुड़ कर देखा।” उसने आँखें खोली। वह वैसे का वैसा था। उसकी हल्की मुस्कराहट उसके चेहरे पर लौट आई थी।
“खाट खाली पड़ी थी। बस तकिया था। मैं अचंभित था, बावरी कहीं नहीं थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था, बावरी विलुप्त हो गई थी, या मैं भ्रमित था, बावरी खाट पर थी ही नहीं, मेरी आँखों को धोका हुआ है।”
मेरे चेहरे की प्रतिक्रिया आँकने के लिए उसने मुझे देखा। उसके शब्द मेरे भीतर जाकर ऐसे गूँज रहे थे, जैसे मैं एक खाली गुम्बद हूँ।
” मैंने इधर उधर अपनी नज़र दौड़ाई। इतने में बावरी की आवाज़ आई- ‘घाबरो मन्ना, इहाँ देखो, खाट री ओट मा।’
आड़ी खड़ी खाट पर जोड़ा नहीं था। ” आओ थे आओ, म्हें लत्ता बदल त्यार हां।”
खाट की ओट में जोड़ा पहने बावरी बैठी थी, लंबा घूँघट किये हुए। मैंने धीरे से हाथ बढ़ा कर घूँघट उठाया। घूँघट के नीचे पीढ़े पर सरकंडों से बनी गणगौर थी।
मेरे पीछे से आवाज़ आई- म्हारी जाण री घडी आ गई। दुखी मत हो ओ। म्हानै राज़ी राज़ी बिदा करो। म्हारो संकल्प पूरो हई गयो।”
इतने में समवेत स्वर में गीत गाने की आवाज़ आई।
” उठाओ भंवर जी, गणगौर उठाओ।”
‘जौ र जुआरा हे गेंहुड़ा सरस बध्या!’
सजी धजी औरतों से हमारा घर भर गया।”
वह मेरी आँखों में उपज रहे अविश्वास को देख रहा था। पर बेपरवाह था। मुझे लगा सच और कल्पना एक हो गए हैं उसके लिए। उसे शायद यह आभास ही नहीं है कि क्या वास्विकता में घट रहा था, और क्या कल्पना में। मैंने बहुत बार यह सोचा है कि सच्ची कहानी तभी बनती है जब वास्तविकता और कल्पना एकसार हो जाते हैं।
वह बोलता जा रहा था।
” मैंने गणगौर उठा रखी थी। मेरे पीछे औरतें गाती हुई चल रही थी। बावरी मेरे साथ चल रही थी। सजी धजी।
जौ र जुआरा हे गेंहुड़ा सरस बध्या…!
ये कन बोया हे ये कन सींच दिया….!
इतने में बहुत सी कुंआरी लड़कियाँ आ गई। बावरी ने धीरे से मुझे बताया। ‘ये सब मेरी अजन्मी सांसर सखियां हैं, भंवर जी।’ वे सब भी गाने लगी:
इस्सर बोया हे बहू गौरा सींच दिया…!
सींच ना जाणी हे पीला पड़ै गया…!
कान्हा बोया हे बहू रुक्मण सींच दिया…!
ये सब गीत मुझे अब तक याद हैं, तुम्हें अचम्भा हो रहा होगा। मेरे आधे शरीर के बदले में मुझे बावरी का आधा जीवन मिला है। वह आज भी मुझ में समाई है। और मेरे इस लोक को त्यागने तक मेरे साथ रहेगी।”
उसने फिर गाना शुरू किया:
“सींच ना जाणी हे पीला पड़ै गया..!
उसने गाने की लय छोड़कर मेरी ओर देखा।
ओनली द क्रीयेटर नोज़ क्रिएशन।..… हम गाते हुए, लालेना पाने से गाँव की फिरनी फिरनी बाबा बिहारी दास के मंदिर तक पहुँच गये थे।”
सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे। ” कौन है यह?” वह अविरल बोलता जा रहा था।
गाने वाली औरतें अपने अपने घरों के विवाहित जोड़ों के नाम ले लेकर यह गीत गाती चल रही थी। उसने दो तीन नाम लेकर यह गीत गाया। वे सब मेरे खानदान के नाम थे। मेरे चाचा चाची के, मेरे चचेरे भाइयों और भाभियों के। यह संयोग नहीं हो सकता था। मेरी धड़कन तेज हो रही थी।
इतने में उसने गाया:
“अनिरुद्ध बोया हे बहू बिमला सींच दिया…!”
” नहीं.. नहीं… चुप करो तुम!.. कौन हो तुम… कौन हो तुम! मुझे पहले ही संदेह था तुम मुझे जानते हो। तुम्हें मेरा नाम पता है… मेरी पत्नी का नाम भी पता है। मेरे गाँव की गलियों को भी तुम जानते हो।”
वह मुझे घूरता रहा। फिर दृढ स्वर में बोला-” मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि पूर्ण आहुति के पल तक तुम बीच में नहीं बोलोगे। मुझे विघ्न नहीं चाहिए।… कहानी में अन्तत: सब पात्र हो जाते हैं, लेखक भी, पाठक भी। रचियता को आभास होना चाहिए कि रचना के साथ वह स्वयं को भी रच रहा होता है। हर रचना के बाद उसका स्वरूप बदल जाता है। जिस दिन हम मिले हम कोई और थे, और आज कोई और। दिस ईज़ हाऊ स्टोरी ट्रांस्फोर्मस लाइफ। कहानी कृत्य है, और कर्ता भी।”
वह चुप होकर बैठ गया। मुझे एहसास दिला रहा था कि मैंने सवाल करके कहानी में विघ्न पैदा किया है, ध्यान रखूँ दोबारा ऐसा नहीं हो।
मेरी मनःस्थिति उस व्यक्ति जैसी थी जो प्रवाह के विरूद्ध तैरता हुआ अन्तत: हाथ पैर छोड़ने का मन बना लेता है। मैंने स्वयं को याद दिलाया, यह मेरा आखिरी दिन है, मैं अब इससे मिलने कभी नहीं आऊँगा।
” तुम्हें कहानी के अंत तक रहना है। हिसाब चुकता करना है।” उसने संयत स्वर में कहा और क्षितिज की ओर देख कर अपनी व्यथा-कथा का सूत्र पकड़ा।
क्रमश: जारी..
