होई जबै द्वै तनहुँ इक
गोद मा खेलें पुरखिए ( अध्याय 6)
“गोद मा खेलें पुरखिए मैं माई तू बाप !” बोल ब्याह के बोल मन में गूँज रहे थे।
क्या सांसरियों में इसकी भी कोई कहानी है? मैं विस्मित था। पुरखे हमारी गोद में खेलें, और हम उनके माँ और बाप बनें। आनुवंशिकी के सिद्धांत याद आये, और माँ का बात बात पर यह कहना, “हमारे बबुआ की सारी आदत इसके नाना जैसी हैं।”
मेरी “वाह” पर उसने मुझे ताड़ कर देखा था। उसे लगा मैं इस पर भी सवाल करूँगा, और उसे नई कहानी सुनाने का मौका मिल जाएगा। पर मैंने अपनी जिज्ञासा को जकड़ कर रखा। दिमाग़ में पैसे की गिनती चल रही थी, यह सच है। साथ ही एक और सवाल मन में उठ रहा था। अगर पूछना हुआ तो पहले यह जानूँगा- “क्या बावरी के बाद सांसर औरतों का शाप ख़त्म हुआ?”
पर आज की बोल ब्याह की कहानी सुनने के बाद मुझे दो सौ रुपये का कोई दुख नहीं था। हाँ, अगर यह आदमी ऐसी ही दिलचस्प कहानियाँ सुनाता रहा तो बात कुछ दिन में लाखों पर पहुँच जायेगी। मुझे जल्द ही इस खेल से निकलना चाहिए। बचपन का एक वाक़या याद आ गया।
उस साल की गर्मी की छुट्टियों में लीलू के साथ उसका चचेरा भाई भी आया था। चेहरा तो अब याद नहीं पर दुबला पतला सा था, बहुत कम बोलता था। सुनता रहता, और फिर अचानक बोलता, ” लगा शर्त !” मुझे याद है बिना हिसाब लगाए मैंने उससे शर्त लगा ली थी। अगर वह शर्त निभानी पड़ती तो मैं आज तक भी उसका क़र्ज़ नहीं उतार सकता था।
उसने कहा था: तुम मुझे आज एक पैसा दो, कल दो, परसों चार, इस तरह रोज़ दुगने करते जाओ, मैं तुम्हें महीने के आख़िरी दिन 5 लाख रुपये वापस दूँगा। पाँच लाख उन दिनों किसी आदमी के पास क्या बैंक के पास भी नहीं होते थे। मैंने बिना सोचे समझे कह दिया “लगी शर्त”। उसने मेरे हाथ पर हाथ मारते हुए कहा, “जा, तू सारी उम्र का कर्ज़दार हो गया मेरा। घर जाकर हिसाब लगा लेना।” उसके
आत्म-विश्वास को देख मेरा चेहरा उतर गया था, और गुणा कर के बाद में हिसाब लगाया तो तीसवें दिन रकम बनी- पचास लाख अड़सठ हज़ार सात सौ नौ रुपये। मुझे ज़ुबानी याद है। उसके बाद रुपये पैसे के मामले में कभी पूरा हिसाब लगाए बिना मैने हाँ नहीं किया।
यहाँ तो मैं 50 रुपये से खेल शुरू कर बैठा। लगा, आज भी मैं वही नादान बच्चा हूँ। काल बीतता नहीं, समा जाता है। सब कुछ यहीं है; हमारे पुरखे, हमारा बचपन। सब कुछ यहीं रहेगा। हम चले जाएँगे।
मैंने फिर से खुद को दिलासा दी।
इतनी अच्छी कहानी सुनने के लिए हज़ार पाँच सौ ज़्यादा नहीं। कुछ नहीं तो एक अच्छी कहानी तो लिखने को मिलेगी। कभी भी इससे मिलना बंद कर दूँगा। यह कौनसा मुझे ढूँढता फिरेगा। कल 400 देकर बावरी की मौत की कहानी सुनता हूँ। फिर देखूँगा।
सोचते हुए मेरी आँख लग गयी।
क्रमश: जारी…..
