रणघोष खास. जेम्स गेलर
अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में लगातार नए प्रयोग हो रहे हैं. अब इसकी सीमा पहले से कहीं आगे बढ़ा दी गई है.
जेनेटिक इंजीनियरिंग से बने सूअरों से निकाले गए शुरुआती अंग लोगों के शरीर में प्रत्यारोपित किए गए थे.
इस तरह के सूअर का हृदय पहली बार जिस मनुष्य के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया था वह सिर्फ दो महीने तक जिंदा रहा था.पूरी दुनिया में इस वक्त प्रत्यारोपण के लिए अंगों की कमी है. ऐसे में अंगों की असीमित सप्लाई के लिए हम सूअरों के इस्तेमाल के कितने करीब हैं?ऑपरेशन थियेटर में चुप्पी पसरी हुई है. यहां सूअर के अंग को प्रत्यारोपण के लिए लाए जाने से पहले तनाव दिख रहा है.सर्जनों ने अभी अभी एक सूअर के गुर्दे को एक मानव शरीर से जोड़ा है. अब मानव शरीर का रक्त सूअर के अंगों की ओर प्रवाहित हो रहा है.?अंग प्रत्यारोपण करने वाले सर्जन डॉ. जेमी लोक का कहना है, “आप सुई गिरने की आवाज भी सुन सकते थे.”
वह कहती हैं, “अगले चंद पलों में इस ऑपरेशन की कामयाबी या नाकामी तय हो जाएगी और अब सबके दिमाग में एक ही सवाल है- गुलाबी या काला?”अगर मानव शरीर ने बाहरी अंग के खिलाफ भयानक हमला बोल दिया तो सूअर के उत्तक में मौजूद हर कोशिका में छेद हो जाएंगे. साथ ही इस अंग में भीतर से बाहर तक थक्का जम जाएगा. इसके बाद पहले यह चितकबरा फिर नीला और फिर कुछ ही मिनटों में काला हो जाएगा.अगर ‘हाइपरएक्यूट रिजेक्शन’ से बच जाते हैं तो यह प्रत्यारोपित अंग खून और ऑक्सीजन से गुलाबी हो जाता है.हाइपरएक्यूट रिजेक्शन प्रत्यारोपण के कुछ ही मिनट बाद शुरू हो जाता है. यह प्रक्रिया तब शुरू होती है जब एंटीजेन का पूरी तरह मिलान नहीं हो पाता है.अंग प्रत्यारोपण ऑपरेशन के बाद अमेरिका में अलबामा यूनिवर्सिटी के डॉक्टर लोक ने कहा, “प्रत्यारोपित अंग गुलाबी हो गया और अब यह खूबसूरत दिख रहा है. अब राहत का अहसास हो रहा है. कमरे में खुशी और उम्मीद का माहौल है.”
यह ऑपरेशन चिकित्सा जगत में कामयाबियों की श्रृखंला में से एक है. इसने जेनोट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में फिर से दिलचस्पी पैदा कर दी है. मानव शरीर के लिए जानवरों के अंग का इस्तेमाल पुराना आइडिया है. इस क्रम में चिंपैंजी के अंडकोष के प्रत्यारोपण से लेकर बंदरों की दूसरी प्रजातियों के गुर्दे और हृदय निकाल कर इस्तेमाल किए जा चुके हैं. हालांकि इन प्रत्यारोपण की परिणति मृत्यु में ही हुई है.दिक्कत यह है कि मानव शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) प्रत्यारोपित अंगों को एक संक्रमण की तरह लेता है और उस पर हमला करता है.इस वक्त प्रत्यारोपण के लिए सबसे ध्यान सूअरों पर है क्योंकि उनके अंगों का आकार अमूमन मानव शरीर के अंगों के आकार के बराबर होता है. सूअर पालने का हमारा अनुभव सदियों पुराना है.
लेकिन अंग प्रत्यारोपण में सबसे बड़ी चुनौती है हाइपरएक्यूट रिजेक्शन. अंग गुलाबी रहे और काला न पड़े, यह भी एक चुनौती है. ऐसा नहीं है कि आप सीधे किसी सूअर के फार्म में जाएं. वहां से एक सूअर पकड़ कर ले जाएं और इसके अंग को मानव शरीर में प्रत्यारोपित कर दें.अंग प्रत्यारोपण के लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग को विकास के कई चरणों से गुजरना पड़ा है ताकि सूअर के डीएनए को बदला जा सके. इस बदलाव से उनके अंग मानव शरीर के प्रतिरोध तंत्र से ज्यादा तालमेल बिठा पाते हैं.हाल में सूअर के गुर्दे और हृदय के जो प्रत्यारोपण हुए उनमें अंग खास तौर पर तैयार ’10- जीन सूअर’ से लिए गए गए थे.महामारी के मौजूदा दौर के साथ प्रदूषण की बढ़ती समस्या, सेहत के लिए एक गंभीर ख़तरा है.दान किए गए किसी अंग को मानव विकास हारमोन को प्रतिक्रिया देने से रोकने और अनियंत्रित वृद्धि से बचाने के लिए इसके जीन में एक बदलाव किया गया था.एक और अहम बदलाव किया गया शर्करा अणु हटा कर. इसे अल्फा-गैल कहा जाता है. यह सूअर की कोशिका की सतह में चिपकता है और एक बड़े चमकते नियोन संकेत की तरह काम करता है. इस तरह यह टिश्यू को पूरी तरह एलियन बना देता है.पूरक प्रणाली कहा जाने वाला हमारे प्रतिरक्षा प्रणाली की एक इकाई अल्फा-गैल का इंतजार करने वाले शरीर की निगरानी करती है. यही वजह है प्रत्यारोपित होने के कुछ ही क्षणों के बाद अंग शरीर की ओर से खारिज कर दिए जाते हैं या मार दिए जाते हैं.
इस प्रयोग के दौरान दो अन्य ‘नियोन संकेत’ जेनेटिक तौर पर हटा दिए गए थे. इसके बजाय छह मानव संकेत जोड़े गए थे. यह सूअर की कोशिकाओं के ऊपर एक छद्म आवरण की तरह काम रहे थे. इससे इन्हें शरीर के प्रतिरोधी तंत्र से छिपने में मदद मिल रही थी.
बहरहाल, जो 10-जीन सूअर तैयार किया जाता है उसे जीवाणुरहित माहौल में बड़ा किया जाता है. ताकि वह प्रत्यारोपण के मुफीद हो सके.