महिला आरक्षण विधेयक के प्रावधान लागू होने के बाद लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 82 से बढ़कर 181 हो जाएगी. लेकिन शुरुआत में राजनीतिक परिवारों की महिलाओं का दबदबा बना रह सकता है.
रणघोष खास. अमोघ रोहमेत्रा दि प्रिंट से
दिप्रिंट द्वारा किए गए डिजिटल संसद वेबसाइट के डेटा का विश्लेषण दिखाता है कि वर्तमान लोकसभा में आधे से अधिक महिला सदस्य लगभग 55 प्रतिशत हैं, जो कि वंशवादी हैं या फिर किसी राजनीतिक परिवारों से आती हैं. यह दर्शाता है कि गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि की महिलाओं की राजनीतिक शक्ति में कम हिस्सेदारी होती है.हालांकि, इसमें बदलाव की उम्मीद है जब महिला आरक्षण विधेयक, जो संसद के निचले सदन और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण (लगभग 33 प्रतिशत) प्रदान करता है, लागू हो जाएगा. विधेयक को पिछले सप्ताह संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिल गई थी, लेकिन यह अगली जनगणना और उस जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के बाद लागू होगा.
आरक्षण के कार्यान्वयन के साथ, संभवतः 2029 या उसके बाद, 545 सदस्यीय लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या मौजूदा 82 से बढ़कर 181 हो जाने की उम्मीद है.दिप्रिंट के विश्लेषण के अनुसार, मौजूदा 82 महिला लोकसभा सांसदों में से 45 वंशवादी हैं. राजवंशों में वे लोग शामिल हैं जिनके परिवार के सदस्य संसद या राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य थे या हैं. इन परिवार के सदस्यों में पति-पत्नी, ससुराल वाले या ब्लड रिलेशन्स शामिल हैं.विश्लेषण से पता चलता है कि जब जीवनसाथी के रूप में निर्वाचित प्रतिनिधि की बात आती है, तो इन 45 महिला लोकसभा सांसदों में से 23 के पति वर्तमान में सांसद या विधायक हैं.राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आरक्षण विधेयक लागू होने के बाद शुरुआत में राजनीतिक राजवंशों से महिला सांसदों का रुझान जारी रहेगा, लेकिन जमीनी स्तर पर अधिक महिला नेताओं के उभरने से चीजें बदल सकती हैं.वंशवादी पृष्ठभूमि से आने वाली महिला सांसदों के बारे में दिप्रिंट से बात करते हुए, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़ के प्रोफेसर संजय कुमार ने कहा, “यह मामला शुरू में चिंता का विषय होगा”.
“हम अचानक यह उम्मीद नहीं कर सकते कि एक तिहाई या 181 महिला सांसद (चुनाव लड़ने के लिए आगे) आएंगी. मैं यह नहीं कह रहा हूं कि 181 महिलाएं नहीं मिलेंगी जिन्हें टिकट दिया जा सके. चिंता की बात यह होगी कि सभी पार्टियां ऐसी महिलाओं को टिकट देने की कोशिश करेंगी जो जीत सकती हैं. संभावना है कि प्रॉक्सी उम्मीदवार सामने आएंगे. और प्रॉक्सी उम्मीदवार बड़े पैमाने पर राजनीतिक परिवारों से आएंगे जो (सत्ता के पदों पर बैठे पुरुषों की) पत्नियां, बहनें, मां और बेटियां होंगी.”उन्होंने कहा कि वंशवादी प्रवृत्ति शुरू में जारी रहेगी लेकिन “आने वाले समय में इसमें बदलाव भी हो सकता है.”
कुमार ने आगे दावा किया कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम होने का कारण “पार्टियां द्वारा उन्हें टिकट नहीं देना” हैं.
उन्होंने दावा किया कि “पार्टियां केवल उन्हीं उम्मीदवारों को टिकट देती हैं जिनके बारे में उन्हें लगता है कि वे चुनाव जीत सकते हैं. पार्टियों का मानना है कि जीतने की संभावना तब अधिक होती है जब कोई महिला नेता राजनीतिक पृष्ठभूमि से हो. इसीलिए, अतीत में निर्वाचित होने वाली ज्यादातर महिलाएं किसी [राजनीतिक] परिवार से आती हैं. तथ्य यह है कि गैर-वंशवादी पृष्ठभूमि की महिला उम्मीदवारों को शायद ही कभी टिकट दिया जाता है.”एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का विचार था कि वंशवादी पृष्ठभूमि ने महिलाओं को राजनीति में मदद की है, खासकर प्रवेश स्तर पर.उन्होंने कहा, “वंशवादी संस्कृति लोकतंत्र विरोधी है क्योंकि इसका मतलब अनुचित लाभ देना है. साथ ही, वंशवादी संस्कृति ने वास्तव में महिलाओं की मदद की है. इसलिए, जब आपके सामने ऐसे [दिप्रिंट का विश्लेषण] आंकड़े आते हैं, तो आपको आश्चर्य होता है कि क्या [राजनीतिक] राजवंश बहुत बुरा है या क्या यह उस प्रणाली का हिस्सा है जो कुछ सकारात्मक प्रदान कर रहा है.”
“महिला कार्यकर्ताओं के जमीनी स्तर पर आगे नहीं आ पाने” पर चिंता जताते हुए किदवई ने कहा, “पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और कुछ अन्य महिलाओं ने अपनी वंशवादी पृष्ठभूमि के आधार पर इसे बड़ा बनाया है, अन्यथा महिलाओं को पार्टी अध्यक्ष या प्रभावशाली पदों पर नहीं रखा जाता. महिलाओं को बहुत संघर्ष करना पड़ता है.” हालांकि, यह सब अब बदल सकता है क्योंकि पिछले सप्ताह 454 लोकसभा सांसदों ने महिला आरक्षण विधेयक के पक्ष में और केवल दो ने विरोध में मतदान किया था, जो राजनीतिक दलों के बीच बड़ी संख्या में महिलाओं को टिकट देने की इच्छा का संकेत देता है.